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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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कानों में पड़ता है। यह शङ्खचूड की माता है। आज उस के बच्चे की बारी है। जीमूतवाहन उसको ढारस बन्धाता है और शङ्खचूड की जगह मरने के लिए अपने आप को प्रस्तुत करता है। परन्तु मां-बेटा इसे नहीं मानते और उसकी वीरता, साहस तथा दक्षिणता की बड़ी सराहना करते हैं। जब वे दोनों मन्दिर में पूजा के लिए प्रवेश करते हैं तो गरुड़ देव पधारते हैं। जीमूतवाहन अपने आप को भेंट करता है और गरुड़ उसे ही लेकर चला जाता है। स्वर्ग से देवता लोग पुष्पवृष्टि करते हैं और दुन्दुभियां बजाते हैं। अन्तिम अंक जीमूतवाहन के श्वशुर की चिन्ता के साथ प्रारम्भ होता है। गरुड़ के आने का समय हो गया है और दामाद अभी तक समुद्र-तट से लौटा नहीं। वह द्वारपाल सुनन्द को जीमूतकेतु के पास यह जानने के लिए भेजते हैं कि शायद जीमूतवाहन उधर पहुँच गया हो। पस्न्तु वह वहां भी नहीं है। जीमूतकेतु की बाईं आंख फरकती है—बड़े अपशकुन की बात है। उसी समय एक मुकुट-मणि उन के आगे आ गिरता है। वृद्धा कहती है कि यह तो मेरे पुत्र का ही दीखता है, परन्तु सुनन्द कहता है कि यह किसी नाग का हो सकता है। सुनन्द को यह पता लगाने के लिए लौटा दिया जाता है कि कुमार अपने श्वसुराल पहुंच गये हैं कि नहीं। तभी शङ्खचूड़ आकर गरुड़ द्वारा जीमूतवाहन के उठाए जाने की वार्ता सुनाता है। सब रोने लगते हैं और अग्नि प्रवेश करने का निश्चय करते हैं। परन्तु शङ्खचूड़ प्रार्थना करता है कि पहिले गरुड़ को ढूंढना चाहिए। सम्भव है कि अभी तक उस ने जीमूतवाहन को न मार डाला हो! उधर गरुड़ नायक के धैर्य को देख विस्मित है और जानना चाहता है कि उस का आज का शिकार कौन है। तभी शङ्खचूड़ आकर उसे बताता है कि यह विद्याधर कुलमणि जीमूतवाहन हैं। अपनी ग़लती जान कर गरुड़ को बड़ा