नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२ ) पश्चाताप होता है। वह आत्महत्या करना चाहता है। उसी समय नायक के माता पिता तथा पत्नी भी वहां पहुंचते हैं। कितना करुणा- जनक दृश्य है ! गरुड़ नायक से ही पूछता हैं कि मेरे पापों का प्रायश्चित क्या है। जीमूतवाहन उसे उपदेश देता है कि किए पाप का पश्चाताप और भविष्य में जीव हत्या न करना। इतने में नायक को पीड़ा बढ़ जाती है। उस की आंखें बन्द हो जाती हैं और वह गिर पड़ता है। फिर रोदन तथा विलाप होने लगता है। गरुड़ बड़ा लज्जित होता है। वह नायक को जिलाने के लिए अमृत लाने स्वर्ग को चला जाता है। जीमूतकेतु शङ्खचूड़ को चिता रचने के लिए कहते हैं। सब का एक साथ मरने का निश्चय है। तभी मलयवती के आह्वान पर देवी गौरी प्रकट होती हैं। जीमूतवाहन को पुनर्जीवित करके उसे खोए हुए राज्य पर प्रतिष्ठापित कर देती हैं। उधर गरुड़ स्वर्ग से अमृत लाता है जिस की वर्षा से उसी के द्वारा मारे गए सब सांप जी उठते हैं और गरुड़ प्रतिज्ञा करता है कि अब मैं सांपों से ऐसा क्रूर बदला नहीं लूंगा। इसी लिए इस नाटक का नाम 'नागानन्द' पड़ा है— अर्थात् "नागों का आनन्द"।