नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६६ ) इन्हों ने मित्रावसु के द्वारा दी गई हुई भी मुझे स्वीकार नहीं किया इस से उदास हो कर इस ने ऐसा निश्चय किया है। नायक - (हर्ष पूर्वक, मन ही मन) क्या यही विश्वावसु की पुत्री मलयवती है ? अथवा, सागर के बिना चन्द्रलेखा की उत्पत्ति कहां हो सकती है ? आह, इस ने मुझे कैसा धोखा दिया है। विदूषक - श्रीमती जी, यदि ऐसा है तब तो मेरा प्रिय मित्र अपराध- रहित है। अथवा, यदि मेरा विश्वास नहीं करतीं तो आप स्वयं जाकर शिलातल को देख सकती हैं। नायिका-(हर्ष तथा लज्जा के साथ, नायक को देखती हुई, हाथ खींचना चाहती है)- छोड़िए, मेरा हाथ छोड़ दीजिए। नायक - (मुस्कराहट सहित) तब तक नहीं छोडूंगा जब तक शिला पर चित्रित मेरी प्राणप्रिया को देख न लेगी। (सब चन्दनलता गृह में प्रवेश करते हैं) विदूषक - (केले के पत्ते को हटाकर) देवी, देखिए, यह हैं इस की प्राणप्रिया।
- निर्वेदः = निराशा; उदासीनता; मन का उचाट होना; वैराग्य; शोक; अपमान;
- ऋते = बिना । इसके साथ पञ्चमी विभक्ति आती है।