नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( १०१ ) नायिका—(देखकर, मुस्कराहट के साथ, अलग) चतुरिके ! यह तो मानो मेरा ही चित्र है! (मानों मैं ही चित्रित की गई हूँ) चेटी—(चित्र की आकृति और नायिका को देखकर) राजकुमारी, क्या कहती है “मानों मैं ही चित्रित हूं”। इस की तो (आप के साथ) इतनी सदृशता है कि यह मालूम ही नहीं होता कि यहां शिलातल पर राजकुमारी का प्रतिबिम्ब पड़ रहा है अथवा आप का चित्र बना है। नायिका—(हँस कर) सखी ! चित्र में मुझे ही चित्रित हुई दिखाकर इन्हों ने मुझे (ही) अपराधिनी बना दिया है। विदूषक—अजी आपका गन्धर्व विवाह हो गया। अतः इसका हाथ छोड़ दो। यह कोई स्त्री जल्दी जल्दी यहां ही आ रही है। नायक—(छोड़ देता है)। [चेटी का प्रवेश]
- मेरा ही चित्र दिखा कर इन्हों ने यह सिद्ध कर दिया है कि मैं ही 'दुर्जन' (दुष्ट) हूँ।
- सम्पूर्ण। हो चुका।