नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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(१११) कि मेरे प्रिय मित्र कुसुमाकर नामी बाग़ में जाएँगे । तो फिर मैं भी वहीं जाता हूँ। (घूमकर और देखकर) यह रहा कुसुमाकर उद्यान ! अतः भीतर जाता हूँ ! (प्रवेश करके, भौंरों द्वारा की गई रुकावट का अभिनय करते हुए) अरे ! क्यों ये दुष्ट भौंरे मुझ पर ही आक्रमण करने लगे। (अपने आप को सूंघ कर) अच्छा, जान लिया । मलयवती के बन्धुजनों ने मुझे दामाद का प्रिय मित्र जान कर बड़े सम्मान के साथ चन्दन आदि का लेप कर दिया है और सन्तान वृक्ष के फूलों का मुकुट भी मेरे सिर पर बांध दिया है। वही यह अति सम्मान (मेरे लिए) अनर्थ बन गया है। अब मैं क्या करूँ ? अथवा, इन्हीं मलयवती से प्राप्त दोनों लाल वस्त्रों से औरत का भेष करके और चादर से घूंघट निकाल कर चलता हूँ । फिर देखूं यह
- आक्रमण करना, कष्ट देना ।
- वर्णक = चन्दन, सुगन्धित रंग, उबटन ।
- सन्तान = इन्द्र के स्वर्ग के पांच वृक्षों में से एक । शेष चारो के नाम ये हैं— मन्दार, पारिजात, कल्प तथा हरिचन्दन !