भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

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पृष्ठ 179

( १४६ ) आप की आज्ञा प्राप्त करके शीघ्र ही ये सिद्ध लोग अपने विमानों में चल पड़ेंगे जो आकाश में चारों तरफ़ उड़ते हुए वर्षा ऋतु के (बादलों के) समान सूर्य की किरणों को छुपा कर दिन को अन्धकारमय कर देंगे । (फिर) उद्दण्ड शत्रु (मतङ्ग) के मारे जाने पर (शेष) राजागण डरके मारे झुक जायेंगे और आप का राज्य सिद्ध (वश में) हो जाएगा । अथवा, सेना के समूह की भी क्या आवश्यकता है ?— वेग के साथ निकाली हुई तलवार की किरणों रूपी (शेर की गर्दन के) बालों से देदीप्यमान मुझ अकेले के द्वारा ही उस दुष्ट मतङ्ग को युद्ध में उसी तरह मारा गया ही समझो जैसे समीप से ही झपट कर शेर के द्वारा हाथियों का राजा । नायक—(कान बन्द कर, मन ही मन) आह, (इसने) बड़े कठोर शब्द कहे हैं । अथवा, इस प्रकार कहता हूँ । (प्रकट) मित्रावसु ! (तुम्हारे आगे) यह (काम) कितना है ? तुम जैसे वीर से तो इस से भी बहुत अधिक सम्भव है ।


  1. ढकना; छिपाना; रोकना ।
  2. उद्द्वृत्त = गर्वित; उद्दण्ड; उच्छृङ्खल ।
  3. राजकं = राजाओं का इकट्ठ; राजागण । 4: आजि = युद्ध ।
  4. बड़ी भुजाओं वाला । जिस में भुज-बल अधिक है । वीर ।