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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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पृष्ठ 181

( १५१ ) : किन्तु—जो बिना मांगे ही कृपा से दूसरे के हित के लिए अपना शरीर भी दे सकता है वह मैं राज्य के लिए कैसे जीवों को मारने की क्रूरता की अनुमति दे सकता हूँ ? और भी, क्लेशों को छोड़ मैं किसी और को शत्रु ही नहीं मानता। यदि तुम मेरा हित करना चाहते हो तो राज्य के लिए क्लेशों का दास बनने वाले उस बेचारे (मतङ्गदेव) पर दया करो। मित्रावसु— (क्रोध पूर्वक, हँसते हुए) (हाँ जी) हम पर उपकार करने वाले, ऐसे बेचारे ग़रीब पर दया क्यों नहीं करनी चाहिए ? नायक— (मन ही मन) (इस समय) यह बड़े जोश में हैं। ताज़ा गुस्से से आक्रान्त चित्त वाले इस को रोकना सम्भव नहीं। तो इस प्रकार (कहता हूँ)— (प्रकट) मित्रावसु ! उठो भीतर ही चलें। वहीं तुम्हें समझाऊँगा ! अब तो दिन ढल गया है। क्योंकि—

  1. कृते = के लिए। इस के साथ षष्ठी का प्रयोग है।
  2. क्लेश = पीड़ा, कष्ट, दुःख। बौद्ध शास्त्रों के अनुसार 'क्लेश' पाप हैं जो पाञ्च हैं; यथा— अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश।
  3. तपस्वी = दया का पात्र; बेचारा।
  4. दूसरा पाठ 'कृतज्ञः' है जिस का अर्थ है 'किए हुए उपकार को मानने वाला।'