नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( १५३ ) कमल के कोश से निद्रा की मुद्रा के बन्धन को लगातार दूर करने वाला (कमल को विकसित करके उसमें बन्द भौंरे को स्वतन्त्र करने वाला), आशाओं (दिशाओं अथवा इच्छाओं) को पूर्ण करने में लगी हुई अपनी किरणों से समग्र संसार को प्रसन्न करने वाला, अस्त होते हुए भी स्तुति से मुखरित मुखों वाले सिद्धों द्वारा दर्शन किए जाने वाला— यह एक सूर्य ही प्रशंसा के योग्य है जिस का (सारा) प्रयत्न दूसरों का हित करने के लिए ही (है) । [सब का प्रस्थान] तीसरा अङ्क समाप्त
- अनिशं = रात दिन; लगातार; सदा ।
- आशा = (i) दिशा; (ii) इच्छा ।
- प्रायः लोग उसी को स्तुति करते हैं जो उदय हो रहा है— उन्नति कर रहा है। परन्तु सूर्य की अस्त होते समय भी स्तुति हो रही है, क्योंकि वह परोपकारी है।