भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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पृष्ठ 193

( १६५ ) बात तो यह है कि नागों की यह विपत्ति (कभी) समाप्त होने वाली नहीं। (मन ही मन) कदाचित् मैं अपना शरीर देकर एक भी सांप की प्राण रक्षा कर सकूँ ! [द्वारपाल का प्रवेश] प्रतीहार— पर्वत की चोटी पर तो चढ़ आया हूँ। तब मित्रावसु को ढूँढता हूँ। (घूमकर) यह मित्रावसु दामाद (जीमूतवाहन) के समीप ठहरे हैं। (पास जाकर) राजकुमार की जय हो। मित्रावसु— सुनन्द ! यहां किस कारण आना हुआ ? प्रतीहार— (कान में कहता है)। मित्रावसु— कुमार ! पिता जी मुझे बुला रहे हैं। नायक— तो जाइए। मित्रावसु— आप को भी बहुत से कष्टों से भरे हुए इस स्थान में देर तक नहीं ठहरना चाहिए। [प्रस्थान] नायक— तो मैं भी इस पर्वत शिखर से उतर कर समुद्रतट को देखता हूँ। [घूमता है] [नेपथ्य में (पर्दे के पीछे से)] हाय बच्चे शङ्खचूड़ ! क्या आज मैं तुम्हें मारे जाते हुए देखूँगी ? नायक— (सुन कर) अरे, यह तो किसी स्त्री का करुण विलाप सा है। यह कौन है ? या इसे कहां से डर है, यह स्पष्ट मालूम करता हूँ। (घूमता है)

१. अनवसाना = जिस का अवसान (अन्त) ही न हो। २. प्रत्यवाय = रुकावट; विघ्न; आपत्ति; कष्ट। ३. यह 'क' प्यार के अर्थ में प्रयुक्त है।