नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७ ) में परस्पर द्वेष भाव नहीं था। स्वयं वे शैव थे परन्तु सूर्य तथा बुद्ध की भी पूजा करते थे। ह्यूनसांग बताते हैं कि वृद्धावस्था में वे बौद्ध ही हो गए थे। ह्यूनसांग ने हर्ष के राज्य की एक और रोचक घटना का उल्लेख किया है। कन्नौज तथा प्रयाग में उन्होंने कई धार्मिक समारोह किए। एक अवसर पर इनके अधीन सारे राजा लोग और मित्र नरेश सम्मि- लित हुए। यह ६४३ ई० की वसन्त ऋतु की वार्ता है। बुद्ध तथा अन्य देवताओं की मूर्तियों के जलूस निकाले गए, सोने तथा मोतियों के दान किए गए, कई भोज हुए और धार्मिक वादविवाद। इस के अतिरिक्त श्री हर्ष प्रयाग में प्रति पांच वर्ष गङ्गा तथा यमुना के संगम पर भारी सम्मेलन किया करते थे और अपना सारा धन बांट दिया करते थे। सम्भवतः इन्हीं अवसरों पर इनके नाटकों का भी अभिनय हुआ करता था; क्योंकि प्रस्तावना में नाना दिशाओं से आए हुए राज- समूहों का उल्लेख है:— “नाना दिग्देशागतेन राज्ञः श्रीहर्षदेवस्य पादपद्मोपजीविना राजसमूहेनोक्तः” इत्यादि। श्री हर्ष स्वयं कवि तथा नाटककार थे। साथ ही कई कवियों के आश्रयदाता भी थे, वे बड़े गुणग्राही थे। उनके दरबार में बाण, मयूर, मतङ्ग, दिवाकर आदि कई प्रशस्त कवि रहा करते थे जिन्हें वे अनेक उपहार दिया करते थे। ६४६ ई० के अन्त में अथवा ६४७ ई० के आरम्भ में श्री हर्ष की मृत्यु हुई। सम्भवतः वे अविवाहित थे। अपने पीछे वे कोई उत्तराधिकारी नहीं छोड़ गए। महाकवि बाण ने “हर्षचरित” लिख कर उन्हें अमर कर दिया है।