भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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( १६ ) श्री हर्ष वर्धन श्री हर्ष थानेसर के राजा प्रभाकर वर्धन के द्वितीय पुत्र थे। उन का जन्म ५६० ई० के लग भग हुआ। उन की माता का नाम यशोवती था। राज्यवर्धन उनके बड़े भाई थे और राज्यश्री छोटी बहिन, जिस का विवाह कन्नौज के मौखरी राजकुमार ग्रहवर्धन से हुआ था। ६०५ में पिता की मृत्यु के पश्चात् राज्यवर्धन राजा बने। मालवा नरेश ने गौडराज शशाङ्क के साथ ग्रहवर्मन् पर आक्रमण कर के उसे मार दिया, राज्यश्री को कैद कर लिया और थानेसर की ओर बढ़ने लगे। राज्यवर्धन ने उनको परास्त किया। परन्तु शशाङ्क ने धोके से राज्यवर्धन को मार डाला और विधवा राज्यश्री विन्ध्याचल के जङ्गल की ओर भाग गई। हर्षवर्धन राजा घोषित हुए। वे अपनी बहिन की खोज में निकले और ठीक उस समय उसे जा मिले जबकि वह आत्महत्या करने ही लगी थी। अब वे अपने शत्रुओं को परास्त कर अपना राज्य विस्तार करने लगे। राज्य के कुछ ही वर्षों में उन्हों ने समस्त उत्तर भारत को अपने राज्य में मिला लिया। और ६१२ ई० में महाराजा- धिराज बन गए। अब दक्षिण भारत में भी अपने राज्य का विस्तार करने के लिए वे सेना को दक्षिण की ओर ले चले। परन्तु चालुक्यवंशी पुलकेशिन द्वितीय से ६२० के लगभग परास्त हुए। परन्तु उत्तर भारत पर उनका निष्कण्टक आधिपत्य बना रहा। कहते हैं १८ राजा लोग उन के आधीन थे। आसाम तथा वलभि के नरेशों ने भी उन से मित्रता बना रखी थी। स्वयं महावीर तथा विजेता होते हुए भी श्री हर्ष प्रजा को धार्मिक सहिष्णुता सिखाते थे। उन के राज्य में बौद्धों तथा ब्राह्मणों