नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८३ ) मुझ जैसे क्षुद्र प्राणी (संसार में कई) पैदा होते हैं और मर जाते हैं। (परन्तु) परोपकार के लिए कमर कस कर तैयार रहने वाले आप जैसे महापुरुषों का जन्म कहां होता है ? अतः इस हठ से क्या लाभ ? इस निश्चय को छोड़ दीजिए। नायक- शङ्खचूड ! चिरकाल के पश्चात् प्राप्त हुए अवसर वाले, परोपकार करने के मेरे मनोरथ में तुम्हें विघ्न नहीं डालना चाहिए। अतः यह हिचकचाहट छोड़ो। यह वध्यचिह्न दे दो ? शङ्खचूड-हे महात्मन् ! क्यों व्यर्थ ही अपने आप को कष्ट दे रहे हो ? शङ्खचूड शङ्ख के समान उज्ज्वल शङ्खपाल के कुल को कलंकित नहीं करेगा। यदि हम आप की दया के पात्र हैं तो ऐसा उपाय सोचिए जिस से मेरी विपत्ति के कारण व्याकुल हुई यह (मेरी माता) जीवन न त्याग दे। नायक - इस में सोचना क्या है ? उपाय तो सोचा हुआ ही है। वह तो तुम पर निर्भर है। शङ्खचूड- कैसे ? नायक - जो तुम्हारे मरने पर मर जाएगी और जीते रहने से जीती रहेगी; उस (माता) को यदि तू जीवित रखना चाहता है तो मेरे प्राणों से अपने को बचा।
- क्षुद्र = नाचीज़, निकम्मे, अकिंचन ।
- जिन्होंने कमर कसी हुई है; जो तैयार हैं।
- अर्थात् ऐसे महानुभावों का जन्म कभी कभी ही होता है।
- काम, निश्चय, फ़ैसला । 5. सोचविचार, हिचकचाहट ।
- हा (अदादिगण, परस्मैपद) + विधिलिङ् + प्रथम पुरुष + एक वचन।