नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( १४५ ) गरुड़— (नायक को देखकर) अन्य नागों की रक्षा के लिए इस वध्यशिला पर पड़े हुए लाल वस्त्र से ढके हुए, मेरे डर से फटे हुए हृदय से बहते हुए रक्त से मानों लिप्त (इस) सांप को अब (मैं) वज्र के समान कठोर चोंच से इस की छाती फाड़ कर, वेग से, खाने के लिए उठा ले जाता हूँ। [झपट कर नायक को पकड़ता है] [नेपथ्य में फूलों की वर्षा होती है और नगाड़ों का शब्द सुनाई देता है] गरुड़— (ऊपर देखकर और सुनकर) अरे ! फूलों की वर्षा और नगाड़ों का शब्द !! (आश्चर्य पूर्वक) अरे ! सुगन्ध से भौंरों को आनन्दित करने वाली यह फूलों की वर्षा आकाश से क्यों हो रही है ? अथवा स्वर्ग में नगाड़ों का यह शब्द सब दिशाओं को क्यों मुखरित कर रहा है ? (हँसकर) ओह, मैं समझ गया। मेरा विचार है कि मेरे वेग से चलने से उत्पन्न हुई वायु से कम्पित यह पारिजात वृक्ष (फूलों की वर्षा कर रहा है) और (संसार का) संहार होने के डर से सब प्रलयकाल के बादल यह गरज रहे हैं।
- केवल उसी दिन के लिए।
- दिग्घं = लिप्त।
- असृजा = खून ३या एक वचन
- मुखरित करना; गुँजाना।