नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६ ) विदूषक आत्रेय मूर्ख और ग्राम्य है। वह मक्खियों से बचने के लिए आवरण ओढ़े हुए है। विट शेखरक उसे अपनी कान्ता नवमालिका समझ कर उससे आलिङ्गन करता है। परन्तु जब नवमालिका आती है तो उसे विदूषक पर बहुत क्रोध आता है; और चाहे वह ब्राह्मण है फिर भी उसे नवमालिका के आगे झुकाता है और बलात् मद्यपान भी करवाता है। कुछ देर पश्चात् नव-विवाहित जोड़े के सम्मुख नवमालिका विदूषक के मुख पर तमालरस मल कर उस का उपहास करती है। मित्रावसु के कथन में कितना ओज और उत्साह भरा है जब वह जीमूतवाहन से कहता है कि आप के "हां" कहने की देर है, बस आप के सब शत्रुओं का शीघ्र ही समूलनाश हो जाएगा। परन्तु जीमूतवाहन के अपने कर्त्तव्य के प्रति और ही विचार हैं। वह कहता है- स्वशरीरमपि परार्थे यः खलु दद्यामयाचितः कृपया। राज्यस्य कृते स कथं प्राणिवधक्रौर्यमनुमन्ये ? अर्थात्- "करुणा से, मैं बिना मांगे ही दूसरे के लिए ख़ुशी ख़ुशी अपना जीवन ही दे दूँ। फिर (केवल मात्र) राज्य के लिए मैं प्राणियों के वध की अनुमति कैसे दे सकता हूँ?" यह उक्ति अति महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह हमें नायक के त्याग के लिए तैयार कर देती है। मरते समय वह गरुड़ को इसी विषय पर उपदेश देता है। नागानन्द के अन्तिम दो अङ्कों में श्री हर्ष नए रूप में दृष्टि- गोचर होते हैं। यहां हमें उस की अद्भुत तथा अलौकिक में रुचि मिलती है। चाहे नाटक की प्रेरणा बौद्ध सिद्धान्तों से मिली है, फिर भी जीमूतवाहन को पुनर्जीवित करने के लिए भगवती गौरी का समावेश किया गया है।