भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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( २० )

पांचवें अङ्क में नायक के माता पिता तथा पत्नी को लाने से नायक का बलिदान और भी अधिक प्रभावोत्पादक हो गया है। इस से करुणा रस की वृद्धि हुई है। अन्तिम दृश्य में नायक के लिए उस के माता पिता तथा पत्नी के द्वारा किए गए विलाप कितने करुणा-जनक हैं ! यह मानना पड़ेगा कि नागानन्द के दो विभिन्न भाग हैं और कि दोनों में निश्चय ही कोई समस्वरता नहीं। पहिले तीन अंकों में शृंगारिक तथा हास्यजनक दृश्य हैं और अन्तिम दोनों में करुणाजनक। परन्तु नाटक में शृंगार अथवा करुणा दोनों में से कोई भी रस प्रधान नहीं दीखता। प्रधानता तो वीर रस की है। वीरता केवल युद्ध करने और विजय प्राप्त करने में ही नहीं होती। वीरता जीमूतवाहन के त्याग में हैं, राज्य छोड़ कर माता-पिता की सेवा के लिए वन जाने में है, वीरता दूसरे की रक्षा के लिए अपना जीवन अपर्ण करने में है, और वीरता दुःख तथा कष्ट में भी शान्त रहने में है। स्वयं गरुड़ भी नायक की इस वीरता से प्रभावित होता है। हां, हम कह रहे थे नागानन्द कई भावों तथा रसों की एक मिश्रित कृति है। फिर भी सामूहिक प्रभाव असफल नहीं है। तीसरे अङ्क के प्रभावशील प्रहसन ने अन्तिम भाग की गम्भीरता का पर्याप्त सन्तुलन किया है। श्री हर्ष का विशेष गुण शृङ्गार पद्यों में दृष्टिगोचर होता है जैसे नागानन्द में नव विवाहिता वधू की लज्जाशीलता के वर्णन में और रत्नावली में धनुर्धारी कामदेव के अचूक निशाने के वर्णन में। नागानन्द में अपनी प्रियतमा की शारीरिक सम्पूर्णता अथवा अदोषता के बारे में हर्ष का वर्णन ठीक भारतीय रुचि के अनुसार ही है। श्री हर्ष को प्राकृत वर्णन भी प्रिय है। कल्पना तथा लालित्य में वह कालिदास से कहीं पीछे है, परन्तु उस के पास सरलता तथा,