नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१ ) भाव-व्यञ्जना के महान गुण हैं। उसकी संस्कृत आदर्श तथा नियमबद्ध है। उसका शब्द तथा अर्थालङ्कारों का प्रयोग संयमित है जिससे रसानुभूति कहीं शिथिल नहीं होती। हर्ष की प्राकृत प्रायः शौरसेनी प्राकृत है। श्लोकों में महाराष्ट्री प्राकृत का प्रयोग है। नौकर द्वारा बोली गई प्राकृत मागधी है। इन प्राकृत रूपों को देखकर हम निःसंशय कह सकते हैं कि श्री हर्ष ने बड़ी सावधानी से प्राकृत व्याकरण का अध्ययन कर रखा था। उसके प्रयुक्त छन्दों को देखने से ऐसा लगता है कि उस ने अपने पूर्व के नाटककारों के सरल छन्दों को नहीं अपनाया, अपितु कठिन और विस्तृत छन्दों का प्रयोग किया है। ऐसे छन्द अभिनय के लिए इतने प्रयुक्त नहीं, परन्तु वर्णन के लिए अधिक अवसर प्रस्तुत करते हैं। शार्दूलविक्रीडित उस को अधिक अभीष्ट है। स्रग्धरा, श्लोक और आर्या इस से कम प्रयुक्त हुए हैं। और शालिनी तथा हरिणी सब से कम। श्री हर्ष की शैली विशेष रूप से सरल है। उस का गद्य अलंकारों से अछूता है। और आश्चर्य की बात यह है कि ऐसी सरलता उस समय अपनाई गई जब कि साहित्यकार बाण की ओज पूर्ण शैली का अनुकरण कर रहे थे। पद्यों में भावुकता पूर्ण वर्णन अवश्य हैं परन्तु वे सीमा-बद्ध हैं और उपयुक्त हैं। उस की शैली लगातार एक जैसी अच्छी है। न कभी वह इस स्तर से बहुत ऊँचे ही उठ पाए हैं और न ही कभी इस से नीचे ही गिरे हैं। श्री हर्ष ने कहीं नाट्यशास्त्र के सिद्धान्तों का उल्लंघन नहीं किया। कई बार तो ऐसा लगता है जैसे उनके नाटक जीवन की अनुभूति से नहीं वरन् नाट्य शास्त्र के ज्ञान से उत्पन्न हुए हों। यदि नाट्य-शास्त्र में भरतमुनि ने कहा है कि उसने सर्वप्रथम अभिनय इन्द्रोत्सव पर किया तो हर्ष का नागानन्द भी इन्द्रोत्सव के दिन ही