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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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अभिनेत हुआ है। इसी प्रकार नाटिकाओं का अभिनय वसन्तोत्सव पर बताया है तो श्री हर्ष की दोनों नाटिकाएँ वसन्तोत्सव पर ही खेली गईं। इसी कारण ही साहित्यकारों ने रत्नावली की बहुत श्लाघा की है। नाट्यशास्त्र में इस बात की मनाही है कि कोई मरा हुआ मनुष्य रङ्गमञ्च पर दिखाया जाए। परन्तु यदि उस पुरुष ने फिर से जीवन प्राप्ति कर लेनी हो (जैसे जीमूतवाहन ने की) तो उसे दिखाने में कोई दोष नहीं। जीमूतवाहन के आत्म-त्याग से तो वास्तविक दुःखान्त नाटक की सूचना मिलती है। परन्तु नाट्य शास्त्र में दुःखान्त नाटकों का निषेध है। इस लिए गौरी के हस्त-क्षेप का आवाहन किया गया है ताकि आत्म-त्याग का पूर्ण फल शीघ्र ही इसी जन्म में ही मिलता दिखाया जा सके। कितनी चतुर और विलक्षण युक्ति है। यह सच है कि श्री हर्ष का आदर्श कालिदास था। उस के नाटकों का इन के नाटकों पर विशेष प्रभाव पड़ा है। नाटिकाओं में कई स्थलों पर मालविकाग्निमित्र के स्मारक मिलते हैं जैसे रत्नावली के बन्दर में मालविकाग्निमित्र के डराने बन्दर की याद आ जाती है। और साङ्कृत्यायनी तो साक्षात् कौशिकी का ही मानो अवतार है। प्रियदर्शिका में नायिका का मधुकरों से त्रस्त हो कर नायक से साक्षात्कार होना कालिदास के शाकुन्तला के पहिले दृश्य का अनुकरण मात्र प्रतीत होता है। नागानन्द में भी कालिदास का प्रभाव कई स्थलों पर दिखाई देता है। प्रथम अङ्क में जब नायक विदूषक के साथ मलय पर्वत पर पहुंचता है तो उस की दाईं आंख फरकती है:— "दक्षिणं स्पन्दते चक्षुः फलाकाङ्क्षा न मे क्वचित् "