भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

( २३ ) यह राजकुमारी मलयवती से मिलने की ओर संकेत हैं, जो कालिदास के अभिज्ञान-शाकुन्तल में आई निम्न उक्ति का अनुकरण प्रतीत होता है:— “शान्तमाश्रम पदं, स्फुरति च बाहुः, कुतो फलमिहास्य” इत्यादि। तृतीय अंक में नायक कहता है:— दृष्टा दृष्टिमधो ददाति कुरुते नालापमाभाषिता, शय्यायां परिवृत्य तिष्ठति बलादालिङ्गिता वेपते । निर्यान्तीषु सखीषु वासभवनान्निर्गन्तुमेवेहते, याता वामतयैव मेऽद्य सुतरां प्रीतयै नवोढा प्रिया ॥ अब इस उक्ति का यह कोई उपयुक्त अवसर नहीं है । उन का विवाह अभी ही हो कर हटा है। स्पष्ट है कि कवि ने कालिदास के कुमारसम्भव में आए निम्न पद्य का अनुकरण किया है:— व्याहृता प्रतिवचो न संदधे गन्तुमैच्छदवलम्बितांशुका । सेवते स्म शयितं पराङ्मुखी सा तथापि रतये पिनाकिनः ॥८,२॥ फिर भी, चाहे श्री हर्ष कालिदास आदि अपने पूर्व कालीन कवियों तथा नाटककारों का ऋणी है, परन्तु हम यह नहीं कह सकते कि उस में मौलिकता है ही नहीं । रत्नावली में उपवन के दृश्य में बन्दर के मैना को उड़ाने की बात हमारे नाटककार की अपनी है । और प्रियदर्शिका में दिया गर्भाङ्क तो अपनी किसम का सर्व प्रथम उदाहरण है ।