नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनागानन्द के दोष किसी भी मानव कृति का सर्वथा दोष रहित होना असम्भव है ! नागानन्द में भी कई दोष दृष्टिगोचर होते हैं, यथा:— १. पहिले तीन अंकों तथा अन्तिम दो अंकों की कथावस्तु में परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं। इस सम्बन्ध को बनाने के लिए कहीं कहीं नायक के आत्म-त्याग के उल्लेख घुसेड़े से गए लगते हैं। परन्तु एकता का प्रभाव बन नहीं पड़ा। एक भाग को पढ़ते समय हम दूसरे भाग की कहानी भूल से जाते है। एक का अस्तित्व दूसरे के विकास के लिए आवश्यक नहीं। २. प्रथम अंक में भगवती गौरी के मन्दिर में नायक तथा नायिका मिलते हैं और परस्पर प्रेमालाप करके बिछुड़ जाते हैं। यह जानने का प्रयत्न नहीं करते कि दूसरा व्यक्ति है कौन ? हालांकि मित्रों द्वारा बड़े सुभीते से यह काम लिया जा सकता था। आगामी दृश्य के लिए यह परस्पर अज्ञान चाहे आवश्यक है परन्तु है कितना अस्वाभाविक ? ३. चतुर्थ अंक में शङ्खचूड़ तथा उस की माता का मन्दिर में चले जाना भी स्वाभाविक नहीं लगता। इस से शङ्खचूड़ के चरित्र में न्यूनता आ गई है। वह नायक को अपनी जगह प्राण देने की अनुमति नही देता। परन्तु गरुड़ के आने के समय उस के चले जाने से तो ऐसा लगता है कि ऊपर से वह चाहे जो कहे परन्तु भीतर से मानो वह अपने प्राण बचाना ही चाहता है। ( २४ )