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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

नागानन्द के दोष किसी भी मानव कृति का सर्वथा दोष रहित होना असम्भव है ! नागानन्द में भी कई दोष दृष्टिगोचर होते हैं, यथा:— १. पहिले तीन अंकों तथा अन्तिम दो अंकों की कथावस्तु में परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं। इस सम्बन्ध को बनाने के लिए कहीं कहीं नायक के आत्म-त्याग के उल्लेख घुसेड़े से गए लगते हैं। परन्तु एकता का प्रभाव बन नहीं पड़ा। एक भाग को पढ़ते समय हम दूसरे भाग की कहानी भूल से जाते है। एक का अस्तित्व दूसरे के विकास के लिए आवश्यक नहीं। २. प्रथम अंक में भगवती गौरी के मन्दिर में नायक तथा नायिका मिलते हैं और परस्पर प्रेमालाप करके बिछुड़ जाते हैं। यह जानने का प्रयत्न नहीं करते कि दूसरा व्यक्ति है कौन ? हालांकि मित्रों द्वारा बड़े सुभीते से यह काम लिया जा सकता था। आगामी दृश्य के लिए यह परस्पर अज्ञान चाहे आवश्यक है परन्तु है कितना अस्वाभाविक ? ३. चतुर्थ अंक में शङ्खचूड़ तथा उस की माता का मन्दिर में चले जाना भी स्वाभाविक नहीं लगता। इस से शङ्खचूड़ के चरित्र में न्यूनता आ गई है। वह नायक को अपनी जगह प्राण देने की अनुमति नही देता। परन्तु गरुड़ के आने के समय उस के चले जाने से तो ऐसा लगता है कि ऊपर से वह चाहे जो कहे परन्तु भीतर से मानो वह अपने प्राण बचाना ही चाहता है। ( २४ )

( २५ ) और फिर, यदि मरने से पहिले मन्दिर पूजा आवश्यक थी तो नाटककार को नायक के लिए इस का विचार क्यों नहीं आया ? ४. नायक की आपत्ति में मलयवती के घर वालों की उदासीनता भी अखरती है । वे ही द्वारपाल को यह जानने के लिए भेजते हैं कि दामाद समुद्र तट से लौटा है कि नहीं । द्वारपाल से उन्हें सूचना मिल जाती है कि नायक कहीं नहीं मिला । फिर वे क्यों मौन बैठे रहते हैं ? वध्य भूमि पर उन को क्यों नहीं ला दिखाया गया ? परन्तु इन गौण दोषों के कारण हम नाटक के वास्तविक गुणों को भूल नहीं सकते । जीमूतवाहन में आत्मत्याग तथा दाक्षिण्यता के उच्च तथा कठिन आदर्श का समावेश सर्वथा सफल हैं । श्रृङ्गार तथा करुणा के वातावरण गढ़ने में और कविता लिखने में श्री हर्ष सिद्ध-हस्त हैं ।

( २८ )

प्रार्थना करता है कि उसे (नायक को) छोड़ दो और मुझे खाओ। क्योंकि उसे यह बात बहुत खटकती है कि उस की जान किसी दूसरे के जीवन से बचाई जा रही है। यह उस के लिए असह्य है, अपमान जनक है। नायक के लिए उसके मन में इतनी श्रद्धा है कि वह कहता है कि यदि यह जीवित न रहे तो मैं भी घर लौट कर नहीं जाऊँगा। ३. गरुड़—नाटककार ने गरुड को अति शक्तिशाली तथा निर्दय दर्शाया है। इसी कारण देवता लोग भी उस से डरते हैं और उस के आगे झुकते हैं। उसे स्वयं भी इस बात का सगर्व मान है। यहां तक कि जब नायक के आत्मत्याग पर देवता लोग फूल बरसाते हैं और दुन्दुभियां बजाते हैं तो गरुड़ समझता है कि यह मेरी ही शक्ति तथा वेग के कारण है। परन्तु इतना भयानक तथा वन्य जन्तु भी नायक की वीरता, धीरता और साहस को देख विस्मित रह जाता है और यह स्वीकार करता है कि 'यह कही मुझ से अधिक वीर है'। और जब उसे अपनी ग़लती का ज्ञान होता है तो वह बहुत पश्चात्ताप करता है। और समझता है कि इस पाप का कोई प्रतिकार नहीं। प्रायश्चित के लिए अपना जीवन त्यागना चाहता है, परन्तु स्वयं नायक उसे इस दुःसाहस से रोक लेता है। उसे अपने काम पर इतनी लज्जा होती है कि वह नायक के माता पिता को मुंह तक नहीं दिखाना चाहता। नायक के सम्मुख घुटने टेक देता है। उस से उपदेश की प्रार्थना करता है और उस पर चलने का प्रण करता है। नायक के कहने पर वह प्रतिज्ञा करता है कि "अब मैं सांपों को नहीं खाऊँगा और पुराने पापों के लिए प्रायश्चित करूँगा"। अमृत वर्षा करके पहिले मारे हुए सब सांपों को पुनर्जीवित भी कर देता है।

( २६ ) ४. मलयवती—यह नाटक की नायिका है। यह सुन्दर सिद्ध कन्या है जो गौरी का वरदान प्राप्त करने के लिए तपस्या करती है। नायक के लिए तो वह स्वर्ग की अप्सरा से भी अधिक रूपवती है। नाटक के शेष पात्र भी उस की सुन्दरता का राग अलापते हैं। उसे आभूषणों की कोई आवश्यकता नहीं, वे तो केवल भार ही हैं। सुन्दर होने के साथ वह विनीत तथा लज्जाशील भी है। इतनी कि जीमूतवाहन से प्रेम करती हुई भी उस के सन्मुख ठहर नहीं सकती; चाहे बाद में वह पछताती है कि उस का जी भरा नहीं। उस के सामने उसे यह भी डर है कि कहीं कोई तपस्वी देख न ले और उसे अविनीत समझे। प्रेमिका के रूप में किसी के सामने होते भी उसे लज्जा होती है। परन्तु उस में स्त्री-सुलभ ईर्ष्या अवश्य है। जब उसे पता लगता है कि जीमूतवाहन का मन किसी और पर आसक्त है तो वह आत्महत्या तक करने पर उतर आती है। परन्तु अन्तिम दुःखान्त दृश्य में उस का चरित्र कोई अच्छा नहीं बन पड़ा। मानों उस में जान ही नहीं, अथवा अपने आप को भूल बैठी हो। वह यह भी नहीं जानती कि अब क्या कहूँ। जो नायक के माता पिता कहते हैं वैसा ही वह कहती है। जैसा वे करते हैं वैसा वह भी करती है। वे अचेत होते हैं तो वह भी अचेत हो जाती है और उन के होश में आने के पश्चात् होश में आती है। शायद माननीय गुरुजनों के आगे वह अपने सच्चे प्रेम भावों तथा करुणात्मक उद्गारों को लज्जावश प्रकट नहीं होने देती। परन्तु हम अपनी नायिका का चरित्र ऐसा नहीं चाहते थे। वह वीर पति की वीर पत्नी नहीं दिखाई देती। हम उस से अधिक आशा रखते

( ३० ) थे ! इस की अपेक्षा नायक की वृद्धा माता में अधिक स्वाभाविकता है। ५. मित्रावसु — यह नायिका का भाई है। इसे अपनी मान प्रतिष्ठा का बहुत ध्यान है। नायक के साथ पहिली बार मिलने पर ही यह अचानक ही बात चीत आरम्भ करते हुए किसी भूमिका के बिना ही अपनी बहिन के साथ विवाह करने को कहता है। नायक को पता नहीं कि उसी की बहिन उस की प्रिया है। वह अस्वीकार कर देता है तो मित्रावसु के मान को ठेस पहुँचती है। एक बार फिर, जब नायक को यह समाचार देने लगता है कि मतङ्ग ने आप का राज्य हड़प लिया है, तो उसे अपने आप पर ग्लानि होती है कि बताने से पहिले मैं ने शत्रु को मार क्यों नहीं भगाया। वह बदला लेना चाहता है परन्तु नायक की आज्ञा के बिना कैसे ? वह बड़ा योधा है और समझता है कि मैं मतङ्ग को अकेला ही बिना किसी बड़ी सेना के मार सकता हूँ।

श्री हर्ष के समय का भारतीय समाज नागानन्द में हर्ष के समय में बौद्ध तथा ब्राह्मण धर्मों का पारस्परिक सम्बन्ध स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। दोनों धर्मों के सिद्धान्तों को कथावस्तु में एक साथ गूंथने से साफ पता लगता है कि उस समय का भारतीय समाज ऐसी अवस्था से गुज़र रहा था जिसमें धार्मिक सहिष्णुता स्वाभाविक सी थी। भारत में बौद्धमत को तीसरी शताब्दी पूर्वेसा में प्रधानता प्राप्त हुई जो कई शताब्दियों तक बनी रही। ईसा की चौथी शताब्दी में गुप्तों के राज्य काल में ब्राह्मण धर्म का प्रचार अपेक्षा-कृत अधिक हो गया था। तत्पश्चात् कई शताब्दियों तक दोनों धर्मों की शक्ति समान सी रही। राजा लोग धार्मिक सहिष्णुता का प्रचार करते थे। ब्राह्मण लोग बौद्धों का मान करते थे। बौद्ध लोग भी आदि संस्कृत ग्रन्थों का अध्ययन किया करते थे और संस्कृत भाषा में ग्रन्थ लिखा और अनुवाद किया करते थे। कहीं आठवीं शताब्दी में जाकर परस्पर वैमनस्य बढ़ा। अतएव नागानन्द में चाहे कहीं कहीं बौद्ध रंग है फिर भी सब श्रेणी के पाठकों ने एक समान इसका स्वागत किया। उस समय लोगों का अलौकिक में विश्वास था— विद्याधरों तथा सिद्धों का उल्लेख, नागों तथा गरुड़ का समावेश; गौरी का नायक को पुनर्जीवित,करना और स्वेच्छा-प्राप्त जल से उस का अभिषेक करना, इस से पहिले स्वप्न में आकर नायिका को वरदान इत्यादि दृश्य इस बात की प्रौढ़ता करते हैं। ( ३१ )

( ३२ ) उस समय धर्म तथा सत्कार्यों का बड़ा महत्त्व था। वृद्धावस्था में राज्य छोड़ वनों में जा कर तपस्या करना दूसरों की रक्षा के लिए आत्मत्याग तथा तप की शक्ति इसी की पुष्टि करते हैं। उस समय भी लोगों के ऐसे ही विश्वास थे जैसे कि अब हैं। उन के विचार में भी नागों की दुनिया समुद्र के नीचे थी, देवताओं का स्वर्ग ऊपर और उन का राजा इन्द्र। तब भी माना जाता था कि अमृत देवताओं के पास है और वह मुर्दों को भी जिला देता है। परन्तु उनके नाग चलते थे और मनुष्यों की भान्ति बोलते थे। उस समय गरुड़ भी घुटनों के बल बैठ कर मनुष्य वाणि बोल सकता था।

पात्र-परिचय १. जीमूतवाहन = नायक – विद्याधर राजकुमार। २. विदूषक = आत्रेय नामक, नायक का मित्र। ३. जीमूतकेतु = नायक के पिता, विद्याधरराज। ४. वृद्धा = नायक की माता। ५. मलयवती = नायिका—सिद्धराज विश्वावसु की कन्या। ६. चतुरिका ७. मनोहरिका } = चेटियां। ८. शेखरक = शराबी विट। ६. नवमालिका = नौकरानी; विट की प्रेयसी। १०. चेट = विट का नौकर। ११. पल्लविका = उद्यान पालिका। १२. सुनन्द = प्रतिहार, विश्वावसु के घर का नौकर। १३. कञ्चुकी = वसुभद्र नामी, अन्तः पुर का वृद्ध अधिकारी। १४. शङ्खचूड़ = एक नाग। १५. वृद्धा = शङ्खचूड़ की माता। १६. मित्रावसु = मलयवती का भाई। १७. गौरी = पार्वती जी। १८. किङ्कर = नागराज वासुकि का नौकर। १६. गरुड = पक्षिराज, सांपों का शत्रु। २०. तापस = शाण्डिल्य नामक मुनि। ( ३३ )

॥ नागानन्दम् ॥

प्रथमोऽङ्कः नान्दी:- ध्यानव्याजमुपेत्य चिन्तयसि कामुन्मील्य चक्षुः क्षणं पश्यान¹ङ्गशरातुरं जनमिमं त्राताऽपि नो² रक्षसि । मिथ्याकारुणिकोऽसि निर्घृ³णतरस्त्वत्तः कुतोऽन्यः पुमान् सेर्ष्यं मारवधूभिरित्यभिहितो बुद्धो जिनः⁴ पातु वः ॥१॥ अपि च-- ⁵ कामेनाकृष्य चापं हतपटुपटहावल्गिभिर्मारवीरै— र्भ्रूभङ्गोत्कम्पजृम्भास्मितचलितदृशा दिव्यनारीजनेन । सिद्धैः ⁶प्रह्वोत्तमाङ्गैः पुलकितवपुषा विस्मयाद्वासवेन,⁷ ‘ध्यायन् बोधेरवाप्तावचलित’ इति वः पातु दृष्टो मुनीन्द्रः॥२॥ श्लोक नं० १, अन्वयः — ‘ध्यानव्याजमुपेत्य कां चिन्तयसि ? क्षणं चक्षु उन्मील्य अनंगशरातुरमिमं जनं पश्य । त्राताऽपि नो रक्षसि ? मिथ्याकारुणिकोऽसि । त्वत्तः निर्घृणतरः अन्यः पुमान् कुतः ?’ इति मारवधूभिः सेर्षम् अभिहितः बुद्धो जिनः वः पातु । श्लोक नं० २, अन्वयः — (यः) कामेन चापमाकृष्य (दृष्टः), मारवीरैः हतपटुपटहावल्गिभिः (दृष्टः), दिव्यनारीजनेन भ्रूभङ्गोत्कम्पजृम्भास्मितचलित- दृशा (दृष्टः) सिद्धैः प्रह्वोत्तमाङ्गैः (दृष्टः), वासवेन विस्मयात् पुलकितवपुषा दृष्टः, बोधेरवाप्तौ अचलितः ध्यायन् इति (सः) मुनीन्द्रः वः पातु ।

( ३ ) पहिला अंक मङ्गलाचरण— "ध्यान के बहाने किस (सुन्दरी) का चिन्तन कर रहे हो ? क्षण भर आंख खोल कर कामदेव के बाणों से पीड़ित हमें देखो। रक्षक होने पर भी (हमारी) रक्षा नहीं करते ? (तो) झूठे ही दयालु (कहलाते) हो । तुम से अधिक निर्दय दूसरा मनुष्य कहां (मिलेगा) ?" इस प्रकार कामदेव की अप्सराओं द्वारा ईर्ष्या के साथ कहे गए विजयी भगवान् बुद्ध आपकी रक्षा करें ॥१॥ और भी— (जो) धनुष बाण का सन्धान करते हुए कामदेव के द्वारा, जोर से बाजे बजाकर नाचते हुए कामदेव के वीर सैनिकों के द्वारा, भ्रूविक्षेप, उत्कम्प जम्हाई, मुस्कान तथा चञ्चल नेत्रों से दिव्य अप्सराओं के द्वारा सिर झुकाते हुए सिद्धों के द्वारा, और विस्मय के कारण पुलकित शरीर वाले इन्द्र के द्वारा—ज्ञान की प्राप्ति में दत्तचित्त हो ध्यान में लगे हुए — देखे गए (वह) श्रेष्ठ मुनि, भगवान् बुद्ध, आप की रक्षा करें ॥२॥

  1. कामदेव। 2. न, नहीं।
  2. निघृण = दयाहीन। 4. विजयी (क्योंकि उन्होंने सांसारिक बन्धनों पर विजय प्राप्त कर ली थी।)
  3. नाचते हुए। 6. झुके हुए।
  4. वासव = इन्द्र।

( ४ ) (नान्द्यन्ते ततः प्रविशति सूत्रधारः) सूत्रधारः—अलमतिविस्तरेण । अद्याहमिन्द्रोत्सवे सबहुमानमाहूय नानादिग्देशागतेन राज्ञः श्रीहर्षदेवस्य पादपद्मोपजीविना राजसमूहेनोक्तः—‘यत्तदस्मत्स्वामिना श्रीहर्षदेवेनापूर्व¹वस्तुरचनाऽलंकृतं विद्याधरजातकप्रतिबद्धं ‘नागानन्दं’ नाम नाटकं कृतमित्यस्माभिः श्रोत्रपरम्परया श्रुतं, न च प्रयोगतो दृष्टम् । तत्तस्यैव राज्ञः सकलजनहृदयाह्लादिनो बहुमानादस्मासु चानुग्रहबुद्ध्या यथावत्प्रयोगेणाद्य त्वया नाटयितव्यमिति । तद्यावदिदानीं नेपथ्यरचनां² कृत्वा यथाऽभिलषितं सम्पादयामि । (परिक्रम्यावलोक्य च) आवर्जितानि³ च सकलसामाजिकमनांसीति मे निश्चयः । यतः— श्री हर्षो निपुणः कविः, परिषद्प्येषा गुणग्राहिणी,⁴ लोके हारि च बोधिसत्त्व⁵चरितं, नाट्ये च दक्षा वयम्। वस्त्वेकैकमपीह वाञ्छितफलप्राप्तेः पदं,⁶ किं पुन- र्मद्भाग्योपच⁷यादयं समुदितः सर्वो गुणानां गणः ॥ ३ ॥ श्लोक नं० ३, अन्वय :— श्री हर्षो निपुणः कविः । एषा परिषदपि गुणग्राहिणी । बोधिसत्त्वचरितं च लोके हारि । वयं च नाट्ये दक्षाः । इह तु एकैकमपि वस्तु वाञ्छितफलप्राप्तेः पदम् । किं पुनः मद्भाग्योपचयाद् गुणानां सर्वो गणः अयं समुदितः ॥

( ५ ) (मंगलाचरण के पश्चात् सूत्रधार का प्रवेश) सूत्रधार —बस, बस, अधिक विस्तार को रहने दो। आज इन्द्रध्वज के महोत्सव के अवसर पर देश देशान्तरों से आए हुए, महाराज श्री हर्ष देव के चरण कमलों की सेवा करने वाले, राजाओं ने मुझे बड़े आदर से बुला कर कहा हैं कि 'हमारे स्वामी श्री हर्ष देव ने कथावस्तु की अपूर्व रचना से अलंकृत विद्याधर जातक से सम्बन्धित 'नागानन्द' नामक नाटक रचा है। ऐसा हम ने कानों कान सुना है, परन्तु उसका अभिनय होते नहीं देखा। इस लिए सब लोगों के मनों को प्रसन्न करने वाले उन्हीं महाराज के प्रति बड़े आदर से और हमारे ऊपर कृपा बुद्धि से हमें उसका ठीक ठीक अभिनय दिखाओ।' अतः इस समय वेशभूषा सजा कर जैसी (इनकी) अभिलाषा है करता हूँ। (घूमकर और देखकर) यह मेरा निश्चय है कि सभी दर्शकों के मन इधर झुके हुए हैं। क्योंकि :— महाराज श्री हर्ष एक निपुण कवि हैं। दर्शकों की यह सभा भी गुणग्राही है। बोधिसत्त्व (सिद्धराज जीमूतवाहन) का चरित्र संसार (भर) में मनोहर है। और हम भी अभिनय दर्शने में प्रवीण हैं। इन में से एक एक चीज़ भी अभीष्ट फल की प्राप्ति कराने वाली है। फिर मेरे सौभाग्य से उपस्थित हुए (इन) सभी गुणों के इस समूह का तो कहना ही क्या? ॥

  1. 'अपूर्व' शब्द 'रचना' के साथ लेना चाहिए, 'वस्तु' के साथ नहीं क्योंकि नाटक की कथावस्तु तो सुविख्यात हुआ करती है।
  2. पर्दे के पीछे पात्रों की यथोचित वेशभूषा आदि का युक्त प्रबन्ध।
  3. आ+वृज्+क्त+नपुं० प्रथमा बहुवचन=झुके हुए: आकृष्ट।
  4. गुणों की कदर करने वाली।
  5. बोधिसत्त्व उस महापुरुष को कहते हैं जो पूर्ण ज्ञान तथा निर्वाण प्राप्त करके बुद्ध होने वाला है। 6. कारण। 7. सञ्चय।

( ६ ) तद्यावदहं गृहं गत्वा गृहिणीमाहूय सङ्गीतकमनुतिष्ठामि । (परिक्रम्य नेपथ्याभिमुखमवलोक्य) इदमस्मद्गृहं । यावत् प्रविशामि । (प्रविश्य) आर्ये, इतस्तावत् । द्विजपरिजनबन्धुहिते ! मद्भवन्तटाकहंसि ! मृदुशीले ! परपुरुषचन्द्रकमलिन्यार्ये ! कार्यादितस्तावत् ॥ ४ ॥ नटी–(प्रविश्य सास्रम् ) अज्ज ! इअम्हि मन्दभग्गा । आणवेदु आर्ये ! इयमस्मि मन्दभाग्या । आज्ञापयतु अज्जउत्तो को णिओओ अणुचिट्ठीअदु त्ति । आर्यपुत्रः को नियोगोऽनुष्ठीयतामिति । सूत्रधारः— (नटीमवलोक्य) आर्ये ! नागानन्दे नाट- यितव्ये किमिदमकारणमेव रुद्यते ? नटी–अज्ज ! कहं ण रोइस्सं ? यदो दाव तादो आर्ये ! कथं न रोदिष्यामि, यतस्तावत् तातः अज्जाए सह थविरंभावं १ जाणिअ अदूरजादणिव्वेदो २ आर्य्यया सह स्थविरभावं ज्ञात्वा अदूरजातनिर्वेदः ‘कुडुम्बभारुव्वहणजोग्गो दाणीं तुमं’ त्ति हिअए कुटुम्बभारोद्वहनयोग्य इदानीं त्वमिति हृदये श्लोक नं० ४, अन्वय :— द्विजपरिजनबन्धु हिते, मद्भवन्तटाकहंसि, मृदुशीले, परपुरुषचन्द्रकमलिनि, आर्ये, कार्याद् इतस्तावत् ।

( ७ ) तो मैं घर जा कर अपनी पत्नी को बुला कर सङ्गीत शुरू करता हूँ । (घूमकर और पर्दे की ओर देखकर) यह हमारा घर है । तो मैं अन्दर जाता हूँ । (प्रवेश करके) श्रीमती जी, ज़रा इधर तो आइए । ब्राह्मण, नौकर चाकर और सम्बन्धियों से हित करने वाली, मेरे गृह रूपी तालाब में हंसिनी के समान (क्रीड़ा करने वाली) कोमल स्वभाव वाली, परपुरुष रूपी चन्द्रमा (को देख कर) कमलिनी के समान (मुरझाने वाली), हे प्रिये, एक ज़रूरी काम हैं, इधर तो आओ ॥ नटी— (प्रवेश करके, आंसुओं के साथ) आर्य, यह हूं मैं मन्दभागिनी । आप आज्ञा दें, मैं किस आदेश का पालन करूं । सूत्रधार— (नटी को देखकर) प्रिये, नागानन्द का अभिनय करने के समय तुम अकारण ही रो क्यो रही हो ? नटी -- आर्य ! कैसे न रोऊं ? क्योंकि (आप के) पिता अपनी वृद्धी अवस्था जान, विरक्त होकर (और) मन में यह सोचकर कि आप अब कुटुम्ब के भार को उठाने के योग्य हैं, माता जी के साथ

  1. बुढापा; बूढी अवस्था । 2. निराशा; उदासीनता; विरक्ति ।

( ८ ) वितक्किअ तवोवणं गदो । वितर्क्य तपोवनं गतः सूत्रधार :— (सनिर्वेदम्) अये ! कथं मां परित्यज्य तपोवनं प्रयातौ पितरौ तत्किमिदानीं युज्यते ? (विचिन्त्य) अथवा कथमहं गुरुचरण परिचर्य्या- सुखं परित्यज्य गृहे तिष्ठामि ? कुतः— पित्रोर्विधातुं शुश्रूषां त्यक्त्वैश्वर्यं क्रमागतम् । वनं याम्यहमप्येष, यथा जीमूतवाहनः ॥ ५ ॥ (इति निष्क्रान्तौ) [आमुखम्] [ततः प्रविशति नायको विदूषकश्च] नायक :— (सनिर्वेदं) वयस्य आत्रेय, रागस्यास्पदमित्यवैमि, न हि मे ध्वंसीति १ न प्रत्ययः कृत्याकृत्यविचारणासु विमुखं को वा न वेत्ति क्षितौ । एवं निन्द्यमपीदमिन्द्रियवशं प्रीतयै भवेद्यौवनं, भक्त्या याति यदीत्थमेव पितरौ शुश्रूषमाणस्य मे ॥६॥ नं० ५, अन्वय :— क्रमागतम् ऐश्वर्यं त्यक्त्वा पित्रोः शुश्रूषां विधातुम् अहमपि वनं यामि यथा एष जीमूतवाहनः ॥ श्लोक नं०६, अन्वय :— (यौवनं) रागस्य आस्पदम् इति अवैमि। नहि ध्वंसि इति न मे प्रत्ययः । (एतत्) कृत्याकृत्यविचारणासु विमुखं (इति) क्षितौ को वा न वेत्ति । एवम् इन्द्रियवशं निन्द्यमपि इदं यौवनं मे प्रीतयै भवेत् यदि इत्थमेव भक्त्या पितरौ शुश्रूषमाणस्य याति ॥

तपोवन् को चले गए हैं। सूत्रधार— (दुःख के साथ) हैं ! क्या माता पिता मुझे छोड़ कर तपोवन चले गए ? तो (मेरे लिए) अब क्या करना ठीक है ? (सोचकर) अथवा, गुरुजनों के चरणों की सेवा के सुख को छोड़ कर मैं घर में कैसे ठहर सकता हूँ ? क्योंकि— कुलपरम्परा से प्राप्त हुए ऐश्वर्य को छोड़ कर माता-पिता की सेवा करने के लिए मैं भी (वैसे ही) बन को जा रहा हूं जैसे यह जीमूतवाहन राजसुख को छोड़, माता-पिता की सेवा के लिए बन चला गया है) (दोनों चले जाते हैं) [नाटक की प्रस्तावना समाप्त] [नायक और विदूषक का प्रवेश] नायक — (खेद के साथ) मित्र आत्रेय, मैं जवानी को विषयवासना का घर समझता हूँ। मेरा विश्वास है कि यह क्षणभंगुर है। (इस) पृथ्वी पर कौन है जो यह यह नहीं जानता कि यह (जवानी) कर्तव्य और अकर्तव्य के विचार करने के विरुद्ध है। इस प्रकार इन्द्रियों के अधीन और निन्दनीय होने पर भी यह जवानी भी मुझे प्रसन्नता दे सकती है यदि (यह) इसी प्रकार भक्तिपूर्वक माता पिता की सेवा करने में ही व्यतीत हो ।

  1. नाशवान्; क्षणभंगुर ।

( १० ) विदूषकः—(सरोषं) भो वअस्स ! ण णिव्विएणो ¹ एव तुमं एतित्तं भो वयस्य, न निर्विण्ण एव त्वमेतावन्तं कालं एदाणं जीवन्तमुआणं ² वुड्ढाणं किदे ³ इमं ईदिसं कालमेतयोर्जीवन्मृतयो वृद्धयोः कृते इदमीदृशं वणवासदुक्खं अणुहवन्तो । ता पसीद । दाणिं पि वनवासदुःखमनुभवन् । तत् प्रसीद । इदानीमपि दाव गुरुचरणसुस्सूसानिब्बन्धादो ⁴ णिव्वत्तिअ तावद्गुरुचरणशुश्रूषानिर्बन्धान्निवृत्य इच्छापरिभोगरमणीज्जं रज्जसोक्खं अणुहवीअदु । इच्छापरिभोगरमणीयं राज्यसौख्यमनुभूयताम् । नायकः—वयस्य, न सम्यगभिहितं त्वया । कुतः ? तिष्ठन् भाति पितुः पुरो भुवि यथा, सिंहासने किं तथा ? यत्संवाहयतः ⁵ सुखं तु चरणौ तातस्य, — किं राजके ⁶? किं भुक्ते भुवनत्रये ⁷ धृतिरसौ, भुक्तोज्झिते ⁸ या गुरो- रायासः ⁹ खलु राज्यमुज्झितगुरोस्तत्रास्ति कश्चिद् गुणः? ॥७ श्लोक नं० ७, अन्वयः— पितुः पुरो भुवि तिष्ठन् यथा भाति, तथा किं सिंहासने (तिष्ठन् भाति) ? तातस्य चरणौ संवाहयतः यत् सुखं किं (तत्) राजके (अस्ति) ? गुरोः भुक्तोज्झिते भुक्ते या धृतिः, किम् असौ भुवनत्रये (भुक्ते अस्ति) ? उज्झितगुरोः राज्यं खलु आयासः । (किं) तत्र कश्चिद् गुणः अस्ति ? ॥

( ७७ ) विदूषक - (क्रोध सहित) अरे मित्र ! जीते हुए भी जो मृतप्राय हैं ऐसे वृद्धों के लिए इतना समय वनवास का दुःख अनुभव करते हुए, क्या आप ऊब नहीं गए ? अच्छा (अब) दया करो । अब भी माता पिता के चरणों की सेवा करने का हठ छोड़कर यथेष्ट विषय उपभोगों से रमणीय राज्य के सुख का अनुभव करो । नायक - मित्र, तुम ने (यह) ठीक नहीं कहा । क्योंकि पिता के सन्मुख भूमि पर बैठा हुआ (पुत्र) जैसे अच्छा लगता है क्या राजसिंहासन पर (बैठा हुआ) वैसा (लग सकता है) ? पिता के पैर दबाने में जो सुख है, क्या वह राजाओं के इकट्ठ में है ? पिता की जूठन खाने में जो तृप्ति है, क्या वह त्रिलोकि के उपभोग में (प्राप्त हो सकती) है ? निश्चय ही पिता को छोड़ने वाले के लिए राज करना केवल क्लेश मात्र ही है। क्या इस में कोई भी गुण है ?

  1. निराश होना; तंग आ जाना ।
  2. जो जीते हुए भी मरे हुए के समान हैं ।
  3. कृते के साथ षष्ठी आती है ।
  4. हठ, ज़िद्द । 5. सम् + वह् + णिच् + शतृ + ६ष्ठी; दबाते हुए ।
  5. राजाओं का इकट्ठ । 7. तृप्ति, आनन्द ।
  6. आदौ भुक्तं पश्चात् उज्झितं, तस्मिन् ।
  7. दुःख, क्लेश, कष्ट ।

( १२ ) विदूषक :—(आत्मगतम् ) अहो से गुरुअणसुस्सूसाणुराओ ! (विचिन्त्य) अहो, अस्य गुरुजनशुश्रूषाऽनुरागः ! भोदु ता एदं पि दाव, अण्णं चित्त भणिस्सं । (प्रकाशं) भवतु, तदेतदपि तावत् , अन्यदिव भणिष्यामि । भो वयस्स ! ण क्खु अहं रज्जसोक्खं ज्जेव केवलं भो वयस्य ! न खल्वहं राज्यसुखमेव केवलम्— उद्दिसिअ एवं भणामि, अण्णं पि दे करणीज्जं अत्थि ज्जेव । उद्दिश्य एवं भणामि, अन्यदपि ते करणीयमस्त्येव। नायकः-(सस्मितं) वयस्य! ननु कृतमेव यत्करणीयम् । पश्य- न्याय्ये वर्त्मनि योजिताः प्रकृतयः१, सन्तः सुखस्थापिताः नीतो बन्धुजनस्तथात्मसमतां, राज्ये च रक्षा कृता । दत्तो दत्तमदोरथाधिकफलः कल्पद्रु मोऽप्यर्थिने, किं कर्तव्यमतःपरं, कथय वा यत्ते स्थितं चेतसि ॥८॥ विदूषकः—भो वयस्स ! अचन्तसाहसिओ मदङ्गदेवहदओ दे भो वयस्य, अत्यन्तसाहसिको मातङ्गदेवहतकस्ते२ श्लोक नं० ८, अन्वयः — (मया) प्रकृतयः न्याय्ये वर्त्मनि योजिताः ; सन्तः सुखं स्थापिताः ; तथा बन्धुजनः आत्मसमतां नीतः ; राज्ये च रक्षा कृता; दत्तमदोरथाधिकफलः कल्पद्रु मोऽपि अर्थिने दत्तः । कथय वा अतः परं (मया) किं कर्तव्यं यत् ते चेतसि स्थितम् (अस्ति)