नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( ७७ ) विदूषक - (क्रोध सहित) अरे मित्र ! जीते हुए भी जो मृतप्राय हैं ऐसे वृद्धों के लिए इतना समय वनवास का दुःख अनुभव करते हुए, क्या आप ऊब नहीं गए ? अच्छा (अब) दया करो । अब भी माता पिता के चरणों की सेवा करने का हठ छोड़कर यथेष्ट विषय उपभोगों से रमणीय राज्य के सुख का अनुभव करो । नायक - मित्र, तुम ने (यह) ठीक नहीं कहा । क्योंकि पिता के सन्मुख भूमि पर बैठा हुआ (पुत्र) जैसे अच्छा लगता है क्या राजसिंहासन पर (बैठा हुआ) वैसा (लग सकता है) ? पिता के पैर दबाने में जो सुख है, क्या वह राजाओं के इकट्ठ में है ? पिता की जूठन खाने में जो तृप्ति है, क्या वह त्रिलोकि के उपभोग में (प्राप्त हो सकती) है ? निश्चय ही पिता को छोड़ने वाले के लिए राज करना केवल क्लेश मात्र ही है। क्या इस में कोई भी गुण है ?
- निराश होना; तंग आ जाना ।
- जो जीते हुए भी मरे हुए के समान हैं ।
- कृते के साथ षष्ठी आती है ।
- हठ, ज़िद्द । 5. सम् + वह् + णिच् + शतृ + ६ष्ठी; दबाते हुए ।
- राजाओं का इकट्ठ । 7. तृप्ति, आनन्द ।
- आदौ भुक्तं पश्चात् उज्झितं, तस्मिन् ।
- दुःख, क्लेश, कष्ट ।