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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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तपोवन् को चले गए हैं। सूत्रधार— (दुःख के साथ) हैं ! क्या माता पिता मुझे छोड़ कर तपोवन चले गए ? तो (मेरे लिए) अब क्या करना ठीक है ? (सोचकर) अथवा, गुरुजनों के चरणों की सेवा के सुख को छोड़ कर मैं घर में कैसे ठहर सकता हूँ ? क्योंकि— कुलपरम्परा से प्राप्त हुए ऐश्वर्य को छोड़ कर माता-पिता की सेवा करने के लिए मैं भी (वैसे ही) बन को जा रहा हूं जैसे यह जीमूतवाहन राजसुख को छोड़, माता-पिता की सेवा के लिए बन चला गया है) (दोनों चले जाते हैं) [नाटक की प्रस्तावना समाप्त] [नायक और विदूषक का प्रवेश] नायक — (खेद के साथ) मित्र आत्रेय, मैं जवानी को विषयवासना का घर समझता हूँ। मेरा विश्वास है कि यह क्षणभंगुर है। (इस) पृथ्वी पर कौन है जो यह यह नहीं जानता कि यह (जवानी) कर्तव्य और अकर्तव्य के विचार करने के विरुद्ध है। इस प्रकार इन्द्रियों के अधीन और निन्दनीय होने पर भी यह जवानी भी मुझे प्रसन्नता दे सकती है यदि (यह) इसी प्रकार भक्तिपूर्वक माता पिता की सेवा करने में ही व्यतीत हो ।

  1. नाशवान्; क्षणभंगुर ।