नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
तपोवन् को चले गए हैं। सूत्रधार— (दुःख के साथ) हैं ! क्या माता पिता मुझे छोड़ कर तपोवन चले गए ? तो (मेरे लिए) अब क्या करना ठीक है ? (सोचकर) अथवा, गुरुजनों के चरणों की सेवा के सुख को छोड़ कर मैं घर में कैसे ठहर सकता हूँ ? क्योंकि— कुलपरम्परा से प्राप्त हुए ऐश्वर्य को छोड़ कर माता-पिता की सेवा करने के लिए मैं भी (वैसे ही) बन को जा रहा हूं जैसे यह जीमूतवाहन राजसुख को छोड़, माता-पिता की सेवा के लिए बन चला गया है) (दोनों चले जाते हैं) [नाटक की प्रस्तावना समाप्त] [नायक और विदूषक का प्रवेश] नायक — (खेद के साथ) मित्र आत्रेय, मैं जवानी को विषयवासना का घर समझता हूँ। मेरा विश्वास है कि यह क्षणभंगुर है। (इस) पृथ्वी पर कौन है जो यह यह नहीं जानता कि यह (जवानी) कर्तव्य और अकर्तव्य के विचार करने के विरुद्ध है। इस प्रकार इन्द्रियों के अधीन और निन्दनीय होने पर भी यह जवानी भी मुझे प्रसन्नता दे सकती है यदि (यह) इसी प्रकार भक्तिपूर्वक माता पिता की सेवा करने में ही व्यतीत हो ।
- नाशवान्; क्षणभंगुर ।
( १० ) विदूषकः—(सरोषं) भो वअस्स ! ण णिव्विएणो ¹ एव तुमं एतित्तं भो वयस्य, न निर्विण्ण एव त्वमेतावन्तं कालं एदाणं जीवन्तमुआणं ² वुड्ढाणं किदे ³ इमं ईदिसं कालमेतयोर्जीवन्मृतयो वृद्धयोः कृते इदमीदृशं वणवासदुक्खं अणुहवन्तो । ता पसीद । दाणिं पि वनवासदुःखमनुभवन् । तत् प्रसीद । इदानीमपि दाव गुरुचरणसुस्सूसानिब्बन्धादो ⁴ णिव्वत्तिअ तावद्गुरुचरणशुश्रूषानिर्बन्धान्निवृत्य इच्छापरिभोगरमणीज्जं रज्जसोक्खं अणुहवीअदु । इच्छापरिभोगरमणीयं राज्यसौख्यमनुभूयताम् । नायकः—वयस्य, न सम्यगभिहितं त्वया । कुतः ? तिष्ठन् भाति पितुः पुरो भुवि यथा, सिंहासने किं तथा ? यत्संवाहयतः ⁵ सुखं तु चरणौ तातस्य, — किं राजके ⁶? किं भुक्ते भुवनत्रये ⁷ धृतिरसौ, भुक्तोज्झिते ⁸ या गुरो- रायासः ⁹ खलु राज्यमुज्झितगुरोस्तत्रास्ति कश्चिद् गुणः? ॥७ श्लोक नं० ७, अन्वयः— पितुः पुरो भुवि तिष्ठन् यथा भाति, तथा किं सिंहासने (तिष्ठन् भाति) ? तातस्य चरणौ संवाहयतः यत् सुखं किं (तत्) राजके (अस्ति) ? गुरोः भुक्तोज्झिते भुक्ते या धृतिः, किम् असौ भुवनत्रये (भुक्ते अस्ति) ? उज्झितगुरोः राज्यं खलु आयासः । (किं) तत्र कश्चिद् गुणः अस्ति ? ॥
( ७७ ) विदूषक - (क्रोध सहित) अरे मित्र ! जीते हुए भी जो मृतप्राय हैं ऐसे वृद्धों के लिए इतना समय वनवास का दुःख अनुभव करते हुए, क्या आप ऊब नहीं गए ? अच्छा (अब) दया करो । अब भी माता पिता के चरणों की सेवा करने का हठ छोड़कर यथेष्ट विषय उपभोगों से रमणीय राज्य के सुख का अनुभव करो । नायक - मित्र, तुम ने (यह) ठीक नहीं कहा । क्योंकि पिता के सन्मुख भूमि पर बैठा हुआ (पुत्र) जैसे अच्छा लगता है क्या राजसिंहासन पर (बैठा हुआ) वैसा (लग सकता है) ? पिता के पैर दबाने में जो सुख है, क्या वह राजाओं के इकट्ठ में है ? पिता की जूठन खाने में जो तृप्ति है, क्या वह त्रिलोकि के उपभोग में (प्राप्त हो सकती) है ? निश्चय ही पिता को छोड़ने वाले के लिए राज करना केवल क्लेश मात्र ही है। क्या इस में कोई भी गुण है ?
- निराश होना; तंग आ जाना ।
- जो जीते हुए भी मरे हुए के समान हैं ।
- कृते के साथ षष्ठी आती है ।
- हठ, ज़िद्द । 5. सम् + वह् + णिच् + शतृ + ६ष्ठी; दबाते हुए ।
- राजाओं का इकट्ठ । 7. तृप्ति, आनन्द ।
- आदौ भुक्तं पश्चात् उज्झितं, तस्मिन् ।
- दुःख, क्लेश, कष्ट ।
( १२ ) विदूषक :—(आत्मगतम् ) अहो से गुरुअणसुस्सूसाणुराओ ! (विचिन्त्य) अहो, अस्य गुरुजनशुश्रूषाऽनुरागः ! भोदु ता एदं पि दाव, अण्णं चित्त भणिस्सं । (प्रकाशं) भवतु, तदेतदपि तावत् , अन्यदिव भणिष्यामि । भो वयस्स ! ण क्खु अहं रज्जसोक्खं ज्जेव केवलं भो वयस्य ! न खल्वहं राज्यसुखमेव केवलम्— उद्दिसिअ एवं भणामि, अण्णं पि दे करणीज्जं अत्थि ज्जेव । उद्दिश्य एवं भणामि, अन्यदपि ते करणीयमस्त्येव। नायकः-(सस्मितं) वयस्य! ननु कृतमेव यत्करणीयम् । पश्य- न्याय्ये वर्त्मनि योजिताः प्रकृतयः१, सन्तः सुखस्थापिताः नीतो बन्धुजनस्तथात्मसमतां, राज्ये च रक्षा कृता । दत्तो दत्तमदोरथाधिकफलः कल्पद्रु मोऽप्यर्थिने, किं कर्तव्यमतःपरं, कथय वा यत्ते स्थितं चेतसि ॥८॥ विदूषकः—भो वयस्स ! अचन्तसाहसिओ मदङ्गदेवहदओ दे भो वयस्य, अत्यन्तसाहसिको मातङ्गदेवहतकस्ते२ श्लोक नं० ८, अन्वयः — (मया) प्रकृतयः न्याय्ये वर्त्मनि योजिताः ; सन्तः सुखं स्थापिताः ; तथा बन्धुजनः आत्मसमतां नीतः ; राज्ये च रक्षा कृता; दत्तमदोरथाधिकफलः कल्पद्रु मोऽपि अर्थिने दत्तः । कथय वा अतः परं (मया) किं कर्तव्यं यत् ते चेतसि स्थितम् (अस्ति)
( १३ ) विदूषक — (मन में) वाह बुजुर्गों की सेवा में इसका लगाव ! (सोच- कर) अच्छा, तो ऐसा हो सही, इसे दूसरी तरह से कहूंगा । (प्रकट) मित्र, मैं केवल राज्य-सुख के लिए ही ऐसा नहीं कह रहा, बल्कि इसलिए भी कि आपको और भी तो (कुछ) करना है । नायक — (मुस्कराते हुए) जो मेरे करने योग्य था वह सब निश्चय ही मैं कर चुका हूं । देखो— प्रजाजनों को न्याय के मार्ग में लगा दिया है । सज्जनों को सुखपूर्वक बसाया है । अपने सम्बन्धियों को अपने ही समान बना दिया है । राज्य में रक्षा स्थापित कर दी है । मनोरथ से भी अधिक फल देने वाला कल्पवृक्ष भी याचकों को दे दिया है । बताओ, इस से अधिक और कौनसा कर्तव्य (शेष) है. जिसके बारे में तुम सोच रहे हो ? विदूषक — मित्र, तुम्हारा शत्रु नीच मातङ्गदेव बड़ा साहसी है ।
- प्रजाजन ।
- नीच, दुष्ट । 'हतक' शब्द समास के अन्त में ही आता है ।
( १४ ) पडिवक्खो, तस्सिं अ समासण्णट्ठिदे पहाणामच्च- प्रतिपक्षः¹ ; तस्मिंश्च समासन्नस्थिते प्रधानामात्य - समधिद्विदं पि ण तुए विणा रज्जं सुथिरं त्ति पडिभादि । समधिष्ठितमपि न त्वया विना राज्यं सुस्थिरमिति प्रतिभाति । नायक.- धिङ् मूर्ख ! मतङ्गो राज्यं हरिष्यतीति शङ्कसे ? विदूषकः- अध इं । अथ किम् । नायकः-यद्येवं ततः किम् ? ननु स्वशरीरात्प्रभृति² सर्वं परार्थमेव मया परिपाल्यते । यत्तु स्वयं न दीयते तत्तातानुरोधात् । तत् किमनेनावस्तुनाचिन्तनेन ? वरं ताताज्ञैवानुष्ठिता । आज्ञापितश्चास्मि तातेन यथा 'वत्स जीमूतवाहन ! बहुदिवसपरिभोगेन³ दूरीकृतकुशकुसुमम् उपभुक्तमूलफलकन्दनीवार- प्रायमिदं⁴ स्थानं वर्तते । तदितो मलयपर्वतं गत्वा किञ्चित्तस्मिन्निवासयोग्यमाश्रमपदं निरूपय' इति । तदेहि मलयपर्वतमेव गच्छावः । विदूषकः-जं भवं आणावेदि एदु भवं । यद्भवानाज्ञापयति । एतु भवान् । (इत्युभौ परिक्रामतः)
( १५ ) उसके समीप ही रहने पर तुम्हारा राज्य, प्रधान मन्त्री द्वारा शासित होने पर भी, तुम्हारे बिना सुस्थिर नहीं है, ऐसा मुझे लगता है। नायक - धिक् मूर्ख, क्या तुम्हारा विचार है कि मतङ्ग मेरा राज्य हर लेगा ? विदूषक - तो और क्या ? नायक - यदि ऐसा ही है तो फिर क्या (हुआ) ? निश्चय ही मैं अपने शरीर से लेकर सब कुछ परोपकार के लिए ही रखता हूं। मैं स्वयं इसे (दूसरों को) नहीं दे रहा यह केवल पिता जी के अनुरोध के ही कारण है। अतः इस तुच्छ वस्तु के (विषय में) सोचने से (भी) क्या लाभ ? पिता जी की आज्ञा का पालन करना ही अच्छा है। पिता जी ने आदेश दिया है कि "वत्स जीमूतवाहन ! बहुत दिनों से उपभोग करने से इस स्थान में कुश तथा फूलों का अभाव हो गया है और कन्द, मूल, फल, नीवार (जंगली चावल) भी उपभोग से समाप्तप्राय हो गए हैं। अतः यहां से मलयपर्वत पर जाकर वहां पर रहने योग्य आश्रम के लिए कोई स्थान देखो।" इसलिए आओ मलय पर्वत को ही चलें। विदूषक - जैसी आपकी आज्ञा । आइए । (दोनों चल पड़ते हैं)
- शत्रु ।
- प्रभृति के साथ पञ्चमी ही आती है। 3. उपभोग, प्रयोग।
- समास के अन्त में 'प्राय' का अर्थ है 'लगभग'।
( १६ ) विदूषकः - (अग्रतोऽवलोक्य) भो वअस्स ! पेक्ख पेक्ख, एसो क्खु भो वयस्य ! प्रेक्षस्व प्रेक्षस्व; एष खलु सरसघणसिणिद्धचंदणवणुच्छङ्गपरिमिलणलग्गबहलपरिमलो सरसघनस्निग्धचन्दनवनोत्सङ्गपरिमिलनलग्नबहल परिमलो^१ विसमतडणिअडणजज्जरिज्जत णिज्झरुच्छलियत ःविषमतटनिपतनजर्जरायमाण निर्झरोच्छलित सिसिरसीअरासारवाही शिशिरसीकरासारवाही^३ पढमसङ्गमुक्कण्ठिअपिआकण्ठग्गहो विअ प्रथमसंगमोत्कण्ठितप्रियाकण्ठग्रह इव मग्गपरिसमं अवणअन्तो मार्गपरिश्रममपनयन् रोमञ्चेदि पिअवअस्सं मलअमारुदो । रोमाञ्चयति प्रियवयस्यं मलयमारुतः । नायकः-(निरूप्य सविस्मयम्) अये प्राप्ता एव वयं मलयपर्वतम् । (समन्तादवलोक्य) अहो रमणीयकमस्य मलयाचलस्य ! तथा हि-
( १७ ) विदूषक - (आगे देखकर) अहो मित्र, देखो, देखो । रसीले घने तथा चिकने चन्दन वन के साथ लगने से अधिक सुगन्धि से युक्त और विषम (ऊबड़ खाबड़) तटों पर गिरने से जर्जरित होने वाले झरनों के उछलते हुए ठण्डे जलकणों के समूह को धारण करने वाली मलय पर्वत की हवा मार्ग की थकावट को दूर करती हुई आपको ऐसे ही रोमाञ्चित कर रही है जैसे प्रथम समागम के लिए उत्कण्ठित प्रियतमा का आलिंगन । नायक—(देख कर, आश्चर्य के साथ) अरे हम तो मलय पर्वत पर पहुंच ही गये । (सब तरफ देखकर) अहा, इस मलय पर्वत की क्या ही रमणीयता है ! क्योंकि—
- स्पर्श, मिलना, साथ लगाना ।
- जो सम नहीं, ऊबड़खाबड़ ।
- वर्षा, बोछाड़ ।
( १८ ) ^1माद्यद्दिग्गजगण्डभित्तिक^2घषणैर्भग्नस्रवच्चन्दनः । क्रन्दत्कन्दरगह्वरो जलनिधेरास्फालितो^3 वीचिभिः। पादालक्तरक्तमौक्तिकशिलः सिद्धाङ्गनानां गतैः, दृष्टोऽयं मलयाचलः किमपि^4 मे चेतः करोत्युत्सुकम् ॥६॥ तदेहि, अत्रारुह्य वासयोग्यं किञ्चिदाश्रमपदं निरूपयावः। विदूषकः — एव्वं करेम्ह । (अग्रतः स्थित्वा) एदु भवं । एवं कुर्व । एतु भवान् । [आरोहणं नाटयतः] नायकः — (दक्षिणाक्षिस्पन्दनं सूचयन् ) अये ! — दक्षिणं स्पन्दते चक्षुः फलाकाङ्क्षा न मे क्वचित्। न च मिथ्या मुनिवचः कथयिष्यति किं न्विदम् ? ॥१० विदूषकः —भो वअस्स ! अवस्समासण्णं दे पिअं णिवेदयदि भो वयस्य ! अवश्यमासन्नं^5 ते प्रियं निवेदयति। नायकः — एवं नाम^6 यथाह भवान् । श्लोक नं०: ९, अन्वयः —माद्यत् दिग्गजगण्डभित्तिकषणैः चन्दनः भग्नस्रवत्, जलनिधेः वीचिभिः आस्फालितः कन्दरगह्वरः क्रन्दत्; सिद्धांगनानां गतैः पादालक्तमौक्तिकशिलः (मलयाचलः), अयं मलयाचलः दृष्टः (एव) चेतः मे किमपि उत्सुकं करोति श्लोक न० १०, अन्वयः — दक्षिणं चक्षुः स्पन्दते, क्वचित् मे फलाकाङ्क्षा न ; मुनिवचः च न मिथ्या, किं नु इदं कथयिष्यति ॥
( १६ ) मदमस्त दिग्गजों के गण्डस्थलों के घर्षण से टूटे हुए चन्दन के वृक्षों से रस चू रहा है; समुद्र की लहरों के टकराने से गुफ़ाएँ गूँज रही हैं ; सिद्धों की स्त्रियों के चलने फिरने से उन के पैरों की महावर (मेंहदी) से (यहां की) मणि शिलाएँ लाल हो गई हैं। यह मलय पर्वत देखने मात्र से (ही) मेरे मन में कुछ (विचित्र) उत्सुकता उत्पन्न कर रहा है । अतः आओ, इस पर चढ कर रहने योग्य आश्रय के लिए कोई स्थान देखें । विदूषक — अच्छा, ऐसा ही करते हैं । (आगे हो कर) आइए (दोनों पर्वत पर चढ़ने का अभिनय करते हैं) नायक — (दाहिनी आंख के फड़कने की सूचना देते हुए) अरे !— (मेरी) दाहिनी आंख फड़क रही है, (परन्तु) मुझे तो किसी फल की इच्छा नहीं । पर मुनियों के वचन झूठे नहीं (हो सकते), फिर यह क्या फल दिखाएगी ? विदूषक — मित्र, अवश्य ही यह समीप ही होने वाली किसी प्रिय बात की सूचना दे रही है । नायक — जैसा तुम कहते हो वैसा ही हो ।
जिसका मद चू रहा है। रगड़, घर्षण । टकराया गया हुआ । कुछ, अवर्णनीय । समीपवर्ति, शीघ्र होने वाली (प्रिय बात) । सचमुच, निश्चय ही ।
( २० ) विदूषकः— (विलोक्य) भो वयस्स ! पेक्ख पेक्ख । एदं खु भो वयस्य ! प्रेक्षस्व प्रेक्षस्व ! एतत् खलु सविसेस घण सिणिद्ध पावव विसोहिअं सुरहिहविगन्ध- सविशेष¹घनस्निग्ध²पादपविशोभितं सुरभिहविर्गन्ध- गब्भिदुद्दामधूमणिग्गमं अणुव्विग्गसुहणिसण्णसावअगणं ³गर्भितोद्दामधूमनिर्गममनुद्वि⁴ग्न सुखनिषण्णशावकगणं तवोवणं विअ लक्खीअदि । तपोवनमिव लक्ष्यते । नायकः— सम्यगुपलक्षितम् । तपोवनमेवैतत् । कुतः— वासोऽर्थं दययेव नातिपृथवः कृत्तास्तरूणां त्वचो, भग्नानेकजर⁵त्कमण्डलु नभःस्वच्छं पयो नैर्झरम्⁶ । दृश्यन्ते त्रुटितोज्झिताश्च ⁷वटुभिर्मौञ्ज्याः ⁸क्वचिन्मेखल नित्याकर्णनया शुकेन च पदं¹⁰ साम्नामिदं पठ्यते ॥११॥ तदेहि प्रविश्य विलोकयावः । [प्रवेशं नाटयतः] श्लोक नं० ११, अन्वयः — वासोऽर्थं तरूणां त्वचः दयया इव अतिपृथवः न कृत्ताः ; नभःस्वच्छं नैर्झरं पयः भग्नानेकजरत्कमण्डलु ; क्वचित् च मौञ्ज्यः मेखलाः वटुभिः त्रुटितोज्झिताः दृश्यन्ते ; नित्याकर्णनया च शुकेन इदं साम्नां पदं पठ्यते ॥
( २१ ) विदूषक- (देख कर) मित्र ! देखो, देखो, निश्चय ही यह अत्यन्त घने और चिकने वृक्षों से सुशोभित तपोवन सा दिखाई दे रहा है, जहां सुगन्धित हवि की सुगन्ध से युक्त बहुत सा धूआं निकल रहा है और जहां पशुओं के शिशु बिना किसी डर के सुख से बैठे हैं। नायक- (तुमने) ठीक देखा है। यह तपोवन ही है। क्योंकि- (यहां) वस्त्रों के लिए वृक्षों की छाल मानों दया के कारण थोड़ी थोड़ी ही छीली गई है; आकाश के समान स्वच्छ झरने के जल में टूटे हुए अनेक पुराने कमण्डलु पड़े हैं; कहीं कहीं मूंज की बनी हुई मेखलाएँ दिखाई दे रही हैं जिन्हें ब्रह्म- चारियों ने टूट जाने के कारण फेंक दिया है; प्रति दिन सुनने से तोता भी सामवेद का यह मन्त्र पढ़ रहा है। तो आओ, भीतर जाकर देखते हैं। [प्रवेश करने का अभिनय करते हैं]
- असाधारण अथवा विशेष रूप से ।
- चिकने, चमकते हुए ।
- भरा हुआ, युक्त ।
- न डरे हुए, न घबराए हुए ।
- जीर्ण ।
- निर्झर (पहाड़ी चश्मे) का (पानी) ।
- वटुः = ब्रह्मचारी; वेदपाठी विद्यार्थी । ब्रह्मचारी ब्राह्मण ।
- मुञ्ज घास की (बनी हुई)
- कमर पर बान्धने की रस्सी ।
- शब्द, पंक्ति अथवा मन्त्र ।
( २२ ) नायकः- (सविस्मयं विलोक्य) अहो !¹ नु खलु मुदित- मुनिजनप्रविचार्यमाणसन्दिग्ध²वेदवाक्यविस्तरस्य. पठद्बटुजनच्छिद्यमानाद्रार्द्रसमिधस्तापसकुमारिकापूर्य- माणबालवृक्षालवालस्य³प्रशान्तरमणीयता⁴ तपो- वनस्य । इह हि— मधुरमिव वदन्ति स्वागतं भृङ्गनादै- र्नतिमिव⁵ फलनम्रैः कुर्वतेऽमी शिरोभिः । मम ददत इवार्घ्यं पुष्पवृष्टिं किरन्तः कथमतिथिसपर्यां⁶ शिक्षिताश्शाखिनोऽपि ॥ १२ ॥ तन्निवासयोग्यमिदं तपोवनम्। मन्ये भविष्यतीह वसता- मस्माकं परा निर्वृत्तिः⁷ । विदूषकः — (इतस्ततो विलोक्य) भो वयस्स किं क्खु एदे ईसिवलिअ- भो वयस्य किं खल्वेते ईषद्वलित—⁸ कन्धरा णिच्चलमुहावसरंतदरदलिअदब्भकवलाः समुण्णमिद- कन्धरा निश्चलमुखापसरद्दर⁹दलितदर्भकवलाः समुन्नमित श्लोक नं १२ अन्वयः— शाखिनोऽपि भृङ्गनादैः मधुरं स्वागतमिव वदन्ति ; फलनम्रैः शिरोभिः अमी नतिमिव कुर्वते ; पुष्पवृष्टिं किरन्तः मम अर्घ्यमिव ददतः ; कथं (शाखिनोऽपि) अतिथिसपर्यां शिक्षिताः ।
( २३ ) नायक- (आश्चर्य के साथ देखकर) अहो यह तपोवन कितना शान्त और सुन्दर है, जहां प्रसन्न मुनिगण सन्दिग्ध वेदवाक्यों पर विचार कर रहे हैं, जहां पढ़ने वाले ब्रह्मचारी गीली गीली समिधाएँ (हवनार्थ लकड़ियां) काट रहे हैं, और जहां ऋषि कन्याएं छोटे छोटे वृक्षों की क्यारियों को (जल से) भर रही हैं। यहां निश्चय से- वृक्ष भौरों की गुंजार से मानों मधुर स्वागत (के शब्द) का उच्चारण कर रहे हैं; फल भार से झुके हुए सिरों से मानों यह प्रणाम कर रहे हैं; और फूलों की वर्षा करते हुए मानों (हमें) अर्घ्य दे रहे हैं। क्या वृक्ष भी (यहां) अतिथि पूजा (करने की विधि) सिखाए गए हैं ? अतः यह तपोवन (हमारे) रहने योग्य है। मेरा विचार है कि यहां रहते हुए हमें अत्यन्त सुख प्राप्त होगा। विदूषक- (इधर उधर देखकर) मित्र, ये हरिण अपनी गरदनों को थोड़ा घुमाए हुए हैं, इन के निश्चल मुखों से अर्ध-चर्वित कुश के कौर गिर रहे हैं, ये ऊपर उठा कर कान लगाए हुए
- "अहो नु खलु" आश्चर्य द्योतक है।
- जिन के अर्थ अनिश्चित हैं, स्पष्ट नहीं, (सन्देहयुक्त)।
- क्यारी।
- शान्त सुन्दरता-तपोवन शान्त भी है और सुन्दर भी।
- नति = सिर झुका कर प्रणाम करना।
- सपर्या = पूजा। 7. तृप्ति, सुख, आनन्द। (परा = बहुत)
- मोड़ना, घुमाना। 9, थोड़ा चबाए हुए।
( २४ ) दिएणैककरणा सुहणिमीलिदलोअणा आअण्णंता विअ दत्तैककर्णाः सुखनिमीलितलोचना आकर्णयन्त इव हरिणा लक्खीअन्ति । हरिणाः लक्ष्यन्ते । नायकः — (कर्णं दत्त्वा) सखे ! सम्यगुपलक्षितम् । तथाहि- स्थानप्राप्त्या दधानं प्रकटितगमकां¹ मन्दतार व्यवस्थां निर्हादिन्या² विपञ्च्या³ मिलितमलिरुतेनेव तन्त्रीस्वनेन । एते दन्तान्तरालस्थिततृणकवलच्छेदशब्दं नियम्य ⁴व्याजिह्वाङ्गाःकुरङ्गाः स्फुटललितपदं गीतमाकर्णयन्ति ॥ १३ ॥ विदूषकः — भो वअस्स ! को उण एसो तवोवणे गाअदि ? भो वयस्य ! कः पुनरेष तपोवने गायति ? नायकः — यथैताः कोमलाङ्गुलितलाभिहन्यमाना⁵ नाति- स्फुटं क्वणन्ति तन्त्र्यः, काकलीप्रधानं च गीयते, तथा तर्कयामि (अङ्गुल्यग्रेणाग्रतो निर्दिशन्) अस्मिन्ना- यतने देवतामाराधयन्ती काचिद्दिव्या योषित्पुपवीण- यतीति । श्लोक नं १३, अन्वयः— एते कुरंगाः , दन्तान्तरालस्थिततृणकवलच्छेदशब्दं नियम्य व्याजिह्वांगाः , स्थान प्राप्त्या प्रकटितगमकां मन्दतारव्यवस्थां दधानं, निर्हादिन्याः विपञ्च्याः तन्त्रीस्वनेन अलिरुतेन इव मिलितम् , स्फुटललितपदं गीतमाकर्णयन्ति ।
( २९ ) हैं, आनन्द से आंखें बन्द किए हुए हैं— मानो ये कुछ सुनते से दिखाई देते हैं। क— (कान लगाकर) मित्र ठीक समझे। क्योंकि— ये हरिण, दांतों के बीच स्थित घास के कौर के चबाने की आवाज़ को रोक कर, अपने अंगों को टेढ़े किए हुए, स्पष्ट तथा सुन्दर पदों वाले गीत को सुन रहे हैं। यह गीत उचित उच्चारण स्थान के प्राप्त करने से गमकों को प्रकटित करने वाली, धीमे तथा उच्च स्वरों की व्यवस्था लिए हुए है। और (यह गीत) बजती हुई वीणा के तारों के गाने के साथ भंवरों की गुञ्जार के समान मिला हुआ है। यक— मित्र, तपोवन में यह कौन गा रहा है? नायक— क्योंकि कोमल अंगुलियों से ताड़ित (वीणा के) तार कोई बहुत स्पष्ट रूप से नहीं बज रहे और गीत में काकली (मधुर तथा सूक्ष्म स्वर) प्रधान है, इससे मेरा विचार है—कि (अंगुली के अग्रभाग से सामने इशारा करते हुए) इस मन्दिर में देवी की आराधना करती हुई कोई दिव्या स्त्री वीणा बजा रही है। अंगुलियों को हिलाने की विधियां। बजने वाली, बजती हुई। विपञ्ची = वीणा। टेढ़े, झुके हुए। ताड़ित
( २६ ) 'विदूषकः—भो वअस्स ! एहि 'अम्हे वि देवदाअदणं भो वयस्य ! एहि, आवामपि देवतायतनं प्रेक्षावहे नायकः— वयस्य ! साधूक्तं भवता । वन्द्याः खलु देवताः (उपसर्पन् सहसा स्थित्वा) वयस्य ! कदाचिद् द्रष्टुं अनर्होऽयं स्त्रीजनो भविष्यति । तदनेन तावत्तमाल- ¹गुल्मकेनान्तरितौ देवतादर्शनावसरं प्रतिपालयावः [तथा कुरुतः [ततः प्रविशति भूमावुपविष्टा वीणां वादयन्ती मलयवती चेटी च नायिका— (गायति) उत्फुल्लकमलकेसर परागगौरद्यु ते ! मम हि गौरि ! अभिवाञ्छितं प्रसिध्यतु² भगवति ! युष्मत्प्रसादेन ॥ नायकः— (कर्णं दत्वा) वयस्य ! अहो³ गीतम् ! वाद्यम् !
श्लोक नं १४, अन्वयः— उत्फुल्लकमलकेसरपरागगौरद्यु ते हि भगवति गौरि ! युष्मत्प्रसादेन मम अभिवाञ्छितं प्रसिध्यतु ।
( २७ ) क- मित्र, आओ, हम भी इस मन्दिर को देखें ।
- मित्र तुमने ठीक कहा है । देवताओं की वन्दना अवश्य करनी चाहिए । (पास जाते जाते सहसा रुक कर) परन्तु मित्र, शायद यह कोई स्त्री हो जिसको देखना उचित न हो । अतः तमाल की झाड़ी के पीछे छिप कर हम देवी के दर्शन के उचित अवसर की प्रतीक्षा करते हैं । (ऐसा ही करते हैं) [भूमि पर बैठी हुई, वीणा बजाती हुई मलयवती और उसकी चेटी का प्रवेश ।] का- (गाती है) :- खिले हुए कमल के केसर की धूलि के समान गौर कान्ति वाली भगवती गौरी ! आपकी कृपा से मेरा मनोरथ पूर्ण हो । क- (कान लगाकर) मित्र, वाह गाना ! वाह बजाना !! गुल्मक = वृक्षों का झुण्ड; लता समूह; झाड़ी । म + सिध् + लोट् - पूर्ण होवे । वाह ! प्रशंसावाचक शब्द ।
२८ ) व्यक्तिर्व्यञ्जनधातुना दशविधेनाप्यत्र लब्धामुना विस्पष्टो ¹द्रुतमध्यलम्बितपरिच्छिन्नस्त्रिधायं लयः । गोपुच्छाप्रमुखाःक्रमेण ²यतयस्तिस्रोऽपि सम्पादिता- स्तत्वौघानुगताश्च वाद्यविधयः³ सम्यक्त्रयो दर्शिताः ॥ १५ ॥ चेटी—(सप्रणयम्) भट्टिदारिए ! चिरं क्खु तुए वादिदं । ण क्खु भर्तृदारिके ! चिरं खलु त्वया वादितम् । न खलु दे परिस्समो अग्गहत्थाणं? ते परिश्रमोऽग्रह⁴स्तयोः ? नायिका—(साधिक्षेपम् ) हञ्जे चउरिए ! कुदो मे देवीए पुरदो वीणं हञ्जे चतुरिके ! कुतो मे देव्याः पुरतो वीणां वादयन्तीए अग्गहत्थाणं परिस्समो ! वादयन्त्या अग्रहस्तयोः परिश्रमः ! चेटी—भट्टिदारिए ! भर्तृदारिके ! णं भणामि किं एदाए णिक्करुणाए पुरदो वाइदेण ननु भणामि किमेतस्या निष्करुणायाः पुरतो वादितेन श्लोक नं० १५, अन्वयः— अत्र अमुना दशविधेनापि व्यञ्जनधातुना व्यक्तिः लब्धा ; द्रुतमध्यलम्बितपरिच्छिन्नः त्रिधा अयं लयः विस्पष्टः ; क्रमेण गोपुच्छाप्रमुखाः तिस्रः यतयः अपि सम्पादिताः ; तत्त्वौघानुगताश्च त्रयो वाद्यविधयः सम्यक् दर्शिताः ।