नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( २७ ) क- मित्र, आओ, हम भी इस मन्दिर को देखें ।
- मित्र तुमने ठीक कहा है । देवताओं की वन्दना अवश्य करनी चाहिए । (पास जाते जाते सहसा रुक कर) परन्तु मित्र, शायद यह कोई स्त्री हो जिसको देखना उचित न हो । अतः तमाल की झाड़ी के पीछे छिप कर हम देवी के दर्शन के उचित अवसर की प्रतीक्षा करते हैं । (ऐसा ही करते हैं) [भूमि पर बैठी हुई, वीणा बजाती हुई मलयवती और उसकी चेटी का प्रवेश ।] का- (गाती है) :- खिले हुए कमल के केसर की धूलि के समान गौर कान्ति वाली भगवती गौरी ! आपकी कृपा से मेरा मनोरथ पूर्ण हो । क- (कान लगाकर) मित्र, वाह गाना ! वाह बजाना !! गुल्मक = वृक्षों का झुण्ड; लता समूह; झाड़ी । म + सिध् + लोट् - पूर्ण होवे । वाह ! प्रशंसावाचक शब्द ।