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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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( १५ ) उसके समीप ही रहने पर तुम्हारा राज्य, प्रधान मन्त्री द्वारा शासित होने पर भी, तुम्हारे बिना सुस्थिर नहीं है, ऐसा मुझे लगता है। नायक - धिक् मूर्ख, क्या तुम्हारा विचार है कि मतङ्ग मेरा राज्य हर लेगा ? विदूषक - तो और क्या ? नायक - यदि ऐसा ही है तो फिर क्या (हुआ) ? निश्चय ही मैं अपने शरीर से लेकर सब कुछ परोपकार के लिए ही रखता हूं। मैं स्वयं इसे (दूसरों को) नहीं दे रहा यह केवल पिता जी के अनुरोध के ही कारण है। अतः इस तुच्छ वस्तु के (विषय में) सोचने से (भी) क्या लाभ ? पिता जी की आज्ञा का पालन करना ही अच्छा है। पिता जी ने आदेश दिया है कि "वत्स जीमूतवाहन ! बहुत दिनों से उपभोग करने से इस स्थान में कुश तथा फूलों का अभाव हो गया है और कन्द, मूल, फल, नीवार (जंगली चावल) भी उपभोग से समाप्तप्राय हो गए हैं। अतः यहां से मलयपर्वत पर जाकर वहां पर रहने योग्य आश्रम के लिए कोई स्थान देखो।" इसलिए आओ मलय पर्वत को ही चलें। विदूषक - जैसी आपकी आज्ञा । आइए । (दोनों चल पड़ते हैं)

  1. शत्रु ।
  2. प्रभृति के साथ पञ्चमी ही आती है। 3. उपभोग, प्रयोग।
  3. समास के अन्त में 'प्राय' का अर्थ है 'लगभग'।