नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( १७ ) विदूषक - (आगे देखकर) अहो मित्र, देखो, देखो । रसीले घने तथा चिकने चन्दन वन के साथ लगने से अधिक सुगन्धि से युक्त और विषम (ऊबड़ खाबड़) तटों पर गिरने से जर्जरित होने वाले झरनों के उछलते हुए ठण्डे जलकणों के समूह को धारण करने वाली मलय पर्वत की हवा मार्ग की थकावट को दूर करती हुई आपको ऐसे ही रोमाञ्चित कर रही है जैसे प्रथम समागम के लिए उत्कण्ठित प्रियतमा का आलिंगन । नायक—(देख कर, आश्चर्य के साथ) अरे हम तो मलय पर्वत पर पहुंच ही गये । (सब तरफ देखकर) अहा, इस मलय पर्वत की क्या ही रमणीयता है ! क्योंकि—
- स्पर्श, मिलना, साथ लगाना ।
- जो सम नहीं, ऊबड़खाबड़ ।
- वर्षा, बोछाड़ ।