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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

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पृष्ठ 47

( १३ ) विदूषक — (मन में) वाह बुजुर्गों की सेवा में इसका लगाव ! (सोच- कर) अच्छा, तो ऐसा हो सही, इसे दूसरी तरह से कहूंगा । (प्रकट) मित्र, मैं केवल राज्य-सुख के लिए ही ऐसा नहीं कह रहा, बल्कि इसलिए भी कि आपको और भी तो (कुछ) करना है । नायक — (मुस्कराते हुए) जो मेरे करने योग्य था वह सब निश्चय ही मैं कर चुका हूं । देखो— प्रजाजनों को न्याय के मार्ग में लगा दिया है । सज्जनों को सुखपूर्वक बसाया है । अपने सम्बन्धियों को अपने ही समान बना दिया है । राज्य में रक्षा स्थापित कर दी है । मनोरथ से भी अधिक फल देने वाला कल्पवृक्ष भी याचकों को दे दिया है । बताओ, इस से अधिक और कौनसा कर्तव्य (शेष) है. जिसके बारे में तुम सोच रहे हो ? विदूषक — मित्र, तुम्हारा शत्रु नीच मातङ्गदेव बड़ा साहसी है ।

  1. प्रजाजन ।
  2. नीच, दुष्ट । 'हतक' शब्द समास के अन्त में ही आता है ।