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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 59, कुल 309 में से

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( २९ ) हैं, आनन्द से आंखें बन्द किए हुए हैं— मानो ये कुछ सुनते से दिखाई देते हैं। क— (कान लगाकर) मित्र ठीक समझे। क्योंकि— ये हरिण, दांतों के बीच स्थित घास के कौर के चबाने की आवाज़ को रोक कर, अपने अंगों को टेढ़े किए हुए, स्पष्ट तथा सुन्दर पदों वाले गीत को सुन रहे हैं। यह गीत उचित उच्चारण स्थान के प्राप्त करने से गमकों को प्रकटित करने वाली, धीमे तथा उच्च स्वरों की व्यवस्था लिए हुए है। और (यह गीत) बजती हुई वीणा के तारों के गाने के साथ भंवरों की गुञ्जार के समान मिला हुआ है। यक— मित्र, तपोवन में यह कौन गा रहा है? नायक— क्योंकि कोमल अंगुलियों से ताड़ित (वीणा के) तार कोई बहुत स्पष्ट रूप से नहीं बज रहे और गीत में काकली (मधुर तथा सूक्ष्म स्वर) प्रधान है, इससे मेरा विचार है—कि (अंगुली के अग्रभाग से सामने इशारा करते हुए) इस मन्दिर में देवी की आराधना करती हुई कोई दिव्या स्त्री वीणा बजा रही है। अंगुलियों को हिलाने की विधियां। बजने वाली, बजती हुई। विपञ्ची = वीणा। टेढ़े, झुके हुए। ताड़ित

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