भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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पृष्ठ 53

( १६ ) मदमस्त दिग्गजों के गण्डस्थलों के घर्षण से टूटे हुए चन्दन के वृक्षों से रस चू रहा है; समुद्र की लहरों के टकराने से गुफ़ाएँ गूँज रही हैं ; सिद्धों की स्त्रियों के चलने फिरने से उन के पैरों की महावर (मेंहदी) से (यहां की) मणि शिलाएँ लाल हो गई हैं। यह मलय पर्वत देखने मात्र से (ही) मेरे मन में कुछ (विचित्र) उत्सुकता उत्पन्न कर रहा है । अतः आओ, इस पर चढ कर रहने योग्य आश्रय के लिए कोई स्थान देखें । विदूषक — अच्छा, ऐसा ही करते हैं । (आगे हो कर) आइए (दोनों पर्वत पर चढ़ने का अभिनय करते हैं) नायक — (दाहिनी आंख के फड़कने की सूचना देते हुए) अरे !— (मेरी) दाहिनी आंख फड़क रही है, (परन्तु) मुझे तो किसी फल की इच्छा नहीं । पर मुनियों के वचन झूठे नहीं (हो सकते), फिर यह क्या फल दिखाएगी ? विदूषक — मित्र, अवश्य ही यह समीप ही होने वाली किसी प्रिय बात की सूचना दे रही है । नायक — जैसा तुम कहते हो वैसा ही हो ।

जिसका मद चू रहा है। रगड़, घर्षण । टकराया गया हुआ । कुछ, अवर्णनीय । समीपवर्ति, शीघ्र होने वाली (प्रिय बात) । सचमुच, निश्चय ही ।