नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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प्रार्थना करता है कि उसे (नायक को) छोड़ दो और मुझे खाओ। क्योंकि उसे यह बात बहुत खटकती है कि उस की जान किसी दूसरे के जीवन से बचाई जा रही है। यह उस के लिए असह्य है, अपमान जनक है। नायक के लिए उसके मन में इतनी श्रद्धा है कि वह कहता है कि यदि यह जीवित न रहे तो मैं भी घर लौट कर नहीं जाऊँगा। ३. गरुड़—नाटककार ने गरुड को अति शक्तिशाली तथा निर्दय दर्शाया है। इसी कारण देवता लोग भी उस से डरते हैं और उस के आगे झुकते हैं। उसे स्वयं भी इस बात का सगर्व मान है। यहां तक कि जब नायक के आत्मत्याग पर देवता लोग फूल बरसाते हैं और दुन्दुभियां बजाते हैं तो गरुड़ समझता है कि यह मेरी ही शक्ति तथा वेग के कारण है। परन्तु इतना भयानक तथा वन्य जन्तु भी नायक की वीरता, धीरता और साहस को देख विस्मित रह जाता है और यह स्वीकार करता है कि 'यह कही मुझ से अधिक वीर है'। और जब उसे अपनी ग़लती का ज्ञान होता है तो वह बहुत पश्चात्ताप करता है। और समझता है कि इस पाप का कोई प्रतिकार नहीं। प्रायश्चित के लिए अपना जीवन त्यागना चाहता है, परन्तु स्वयं नायक उसे इस दुःसाहस से रोक लेता है। उसे अपने काम पर इतनी लज्जा होती है कि वह नायक के माता पिता को मुंह तक नहीं दिखाना चाहता। नायक के सम्मुख घुटने टेक देता है। उस से उपदेश की प्रार्थना करता है और उस पर चलने का प्रण करता है। नायक के कहने पर वह प्रतिज्ञा करता है कि "अब मैं सांपों को नहीं खाऊँगा और पुराने पापों के लिए प्रायश्चित करूँगा"। अमृत वर्षा करके पहिले मारे हुए सब सांपों को पुनर्जीवित भी कर देता है।