नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६ ) ४. मलयवती—यह नाटक की नायिका है। यह सुन्दर सिद्ध कन्या है जो गौरी का वरदान प्राप्त करने के लिए तपस्या करती है। नायक के लिए तो वह स्वर्ग की अप्सरा से भी अधिक रूपवती है। नाटक के शेष पात्र भी उस की सुन्दरता का राग अलापते हैं। उसे आभूषणों की कोई आवश्यकता नहीं, वे तो केवल भार ही हैं। सुन्दर होने के साथ वह विनीत तथा लज्जाशील भी है। इतनी कि जीमूतवाहन से प्रेम करती हुई भी उस के सन्मुख ठहर नहीं सकती; चाहे बाद में वह पछताती है कि उस का जी भरा नहीं। उस के सामने उसे यह भी डर है कि कहीं कोई तपस्वी देख न ले और उसे अविनीत समझे। प्रेमिका के रूप में किसी के सामने होते भी उसे लज्जा होती है। परन्तु उस में स्त्री-सुलभ ईर्ष्या अवश्य है। जब उसे पता लगता है कि जीमूतवाहन का मन किसी और पर आसक्त है तो वह आत्महत्या तक करने पर उतर आती है। परन्तु अन्तिम दुःखान्त दृश्य में उस का चरित्र कोई अच्छा नहीं बन पड़ा। मानों उस में जान ही नहीं, अथवा अपने आप को भूल बैठी हो। वह यह भी नहीं जानती कि अब क्या कहूँ। जो नायक के माता पिता कहते हैं वैसा ही वह कहती है। जैसा वे करते हैं वैसा वह भी करती है। वे अचेत होते हैं तो वह भी अचेत हो जाती है और उन के होश में आने के पश्चात् होश में आती है। शायद माननीय गुरुजनों के आगे वह अपने सच्चे प्रेम भावों तथा करुणात्मक उद्गारों को लज्जावश प्रकट नहीं होने देती। परन्तु हम अपनी नायिका का चरित्र ऐसा नहीं चाहते थे। वह वीर पति की वीर पत्नी नहीं दिखाई देती। हम उस से अधिक आशा रखते