भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 39, कुल 309 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 39

( ५ ) (मंगलाचरण के पश्चात् सूत्रधार का प्रवेश) सूत्रधार —बस, बस, अधिक विस्तार को रहने दो। आज इन्द्रध्वज के महोत्सव के अवसर पर देश देशान्तरों से आए हुए, महाराज श्री हर्ष देव के चरण कमलों की सेवा करने वाले, राजाओं ने मुझे बड़े आदर से बुला कर कहा हैं कि 'हमारे स्वामी श्री हर्ष देव ने कथावस्तु की अपूर्व रचना से अलंकृत विद्याधर जातक से सम्बन्धित 'नागानन्द' नामक नाटक रचा है। ऐसा हम ने कानों कान सुना है, परन्तु उसका अभिनय होते नहीं देखा। इस लिए सब लोगों के मनों को प्रसन्न करने वाले उन्हीं महाराज के प्रति बड़े आदर से और हमारे ऊपर कृपा बुद्धि से हमें उसका ठीक ठीक अभिनय दिखाओ।' अतः इस समय वेशभूषा सजा कर जैसी (इनकी) अभिलाषा है करता हूँ। (घूमकर और देखकर) यह मेरा निश्चय है कि सभी दर्शकों के मन इधर झुके हुए हैं। क्योंकि :— महाराज श्री हर्ष एक निपुण कवि हैं। दर्शकों की यह सभा भी गुणग्राही है। बोधिसत्त्व (सिद्धराज जीमूतवाहन) का चरित्र संसार (भर) में मनोहर है। और हम भी अभिनय दर्शने में प्रवीण हैं। इन में से एक एक चीज़ भी अभीष्ट फल की प्राप्ति कराने वाली है। फिर मेरे सौभाग्य से उपस्थित हुए (इन) सभी गुणों के इस समूह का तो कहना ही क्या? ॥

  1. 'अपूर्व' शब्द 'रचना' के साथ लेना चाहिए, 'वस्तु' के साथ नहीं क्योंकि नाटक की कथावस्तु तो सुविख्यात हुआ करती है।
  2. पर्दे के पीछे पात्रों की यथोचित वेशभूषा आदि का युक्त प्रबन्ध।
  3. आ+वृज्+क्त+नपुं० प्रथमा बहुवचन=झुके हुए: आकृष्ट।
  4. गुणों की कदर करने वाली।
  5. बोधिसत्त्व उस महापुरुष को कहते हैं जो पूर्ण ज्ञान तथा निर्वाण प्राप्त करके बुद्ध होने वाला है। 6. कारण। 7. सञ्चय।