भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 309 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 41

( ७ ) तो मैं घर जा कर अपनी पत्नी को बुला कर सङ्गीत शुरू करता हूँ । (घूमकर और पर्दे की ओर देखकर) यह हमारा घर है । तो मैं अन्दर जाता हूँ । (प्रवेश करके) श्रीमती जी, ज़रा इधर तो आइए । ब्राह्मण, नौकर चाकर और सम्बन्धियों से हित करने वाली, मेरे गृह रूपी तालाब में हंसिनी के समान (क्रीड़ा करने वाली) कोमल स्वभाव वाली, परपुरुष रूपी चन्द्रमा (को देख कर) कमलिनी के समान (मुरझाने वाली), हे प्रिये, एक ज़रूरी काम हैं, इधर तो आओ ॥ नटी— (प्रवेश करके, आंसुओं के साथ) आर्य, यह हूं मैं मन्दभागिनी । आप आज्ञा दें, मैं किस आदेश का पालन करूं । सूत्रधार— (नटी को देखकर) प्रिये, नागानन्द का अभिनय करने के समय तुम अकारण ही रो क्यो रही हो ? नटी -- आर्य ! कैसे न रोऊं ? क्योंकि (आप के) पिता अपनी वृद्धी अवस्था जान, विरक्त होकर (और) मन में यह सोचकर कि आप अब कुटुम्ब के भार को उठाने के योग्य हैं, माता जी के साथ

  1. बुढापा; बूढी अवस्था । 2. निराशा; उदासीनता; विरक्ति ।
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या) · पृष्ठ 41, कुल 309 में से · BharatKosha