भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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श्री हर्ष के समय का भारतीय समाज नागानन्द में हर्ष के समय में बौद्ध तथा ब्राह्मण धर्मों का पारस्परिक सम्बन्ध स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। दोनों धर्मों के सिद्धान्तों को कथावस्तु में एक साथ गूंथने से साफ पता लगता है कि उस समय का भारतीय समाज ऐसी अवस्था से गुज़र रहा था जिसमें धार्मिक सहिष्णुता स्वाभाविक सी थी। भारत में बौद्धमत को तीसरी शताब्दी पूर्वेसा में प्रधानता प्राप्त हुई जो कई शताब्दियों तक बनी रही। ईसा की चौथी शताब्दी में गुप्तों के राज्य काल में ब्राह्मण धर्म का प्रचार अपेक्षा-कृत अधिक हो गया था। तत्पश्चात् कई शताब्दियों तक दोनों धर्मों की शक्ति समान सी रही। राजा लोग धार्मिक सहिष्णुता का प्रचार करते थे। ब्राह्मण लोग बौद्धों का मान करते थे। बौद्ध लोग भी आदि संस्कृत ग्रन्थों का अध्ययन किया करते थे और संस्कृत भाषा में ग्रन्थ लिखा और अनुवाद किया करते थे। कहीं आठवीं शताब्दी में जाकर परस्पर वैमनस्य बढ़ा। अतएव नागानन्द में चाहे कहीं कहीं बौद्ध रंग है फिर भी सब श्रेणी के पाठकों ने एक समान इसका स्वागत किया। उस समय लोगों का अलौकिक में विश्वास था— विद्याधरों तथा सिद्धों का उल्लेख, नागों तथा गरुड़ का समावेश; गौरी का नायक को पुनर्जीवित,करना और स्वेच्छा-प्राप्त जल से उस का अभिषेक करना, इस से पहिले स्वप्न में आकर नायिका को वरदान इत्यादि दृश्य इस बात की प्रौढ़ता करते हैं। ( ३१ )