नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( ३२ ) उस समय धर्म तथा सत्कार्यों का बड़ा महत्त्व था। वृद्धावस्था में राज्य छोड़ वनों में जा कर तपस्या करना दूसरों की रक्षा के लिए आत्मत्याग तथा तप की शक्ति इसी की पुष्टि करते हैं। उस समय भी लोगों के ऐसे ही विश्वास थे जैसे कि अब हैं। उन के विचार में भी नागों की दुनिया समुद्र के नीचे थी, देवताओं का स्वर्ग ऊपर और उन का राजा इन्द्र। तब भी माना जाता था कि अमृत देवताओं के पास है और वह मुर्दों को भी जिला देता है। परन्तु उनके नाग चलते थे और मनुष्यों की भान्ति बोलते थे। उस समय गरुड़ भी घुटनों के बल बैठ कर मनुष्य वाणि बोल सकता था।