नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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( १६७ ) नायक- (मन ही मन) सौभाग्य वश, मैं कृतार्थ हो गया । गरुड़- (नायक को देखते हुए)- जिस प्रकार से यह नागों की रक्षा करने वाला मुझे भारी (अथवा श्रेष्ठ) लगता है उस से स्पष्ट रूप से (जान पड़ता है कि) आज (यह मेरी) साँपों को खाने की इच्छा को बुझा देगा । अतः इसे लेकर मलयपर्वत पर चढ कर यथेष्ट (पेट भर) भोजन करता हूँ । [प्रस्थान] चतुर्थ अङ्क समाप्त ।
- गुरु = भारी; आचार्य; श्रेष्ठ।
- दूर कर देगा; बुझा देगा । पताका स्थान ।