नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २१५ ) शङ्खचूड— सुनिए— मैं शङ्खचूड नामक नाग हूँ। मुझे वासुकि ने गरुड़ के पास खाने के लिए भेजा था। अधिक विस्तार से क्या लाभ ? कहीं यह खून की धारा का मार्ग धूलि से ढक जाने से कठिनता से दिखाई पड़ने लगे । अतः संक्षेप से कहता हूँ।— करुणापूर्ण चित्त वाले किसी विद्याधर ने गरुड़ को अपना शरीर देकर मेरे प्राणों की रक्षा की है। जीमूतकेतु—कौन दूसरा इस प्रकार परोपकार में लगन रखता है ? पुत्र, साफ़ साफ़ कहो कि जीमूतवाहन ने (तुम्हारे प्राण बचाए हैं) । आह, मैं अभागा मारा गया ! वृद्धा— हाय बच्चे, तू ने ऐसा क्यों किया ? मलयवती— (आँसुओं के साथ) क्या जिस अमङ्गल की मुझे शङ्का थी वह सच ही हो गया। [सब मूर्छित हो जाते हैं] शङ्खचूड़—(आंसुओं के साथ) अवश्य ही ये ही (दोनों) उस महात्मा के माता पिता हैं। अप्रिय वचन बोल कर मैं ने इन्हें इस दशा को क्यों पहुँचाया है ? अथवा, साँप के मुख से विष के विना और क्या निकल सकता है ? आह, प्राण दान करने वाले जीमूतवाहन
- करुणा ने जिस के मन पर काबू पा लिया है; अथवा, करुणा से भरे मन वाला।
- जिस को परोपकार करने की लत है।