भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 309 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 245

( २२१ ) जीमूतकेतु—हे पतिव्रते ! इस प्रकार क्यों व्याकुल हो रही हो ? हम सब का यही निश्चय है। वृद्धा—महाराज ! तो हम किस की प्रतीक्षा कर रहे हैं ? जीमूतकेतु—देवी ! किसी की नहीं। परन्तु अग्निहोत्री का दाह संस्कार किसी दूसरी अग्नि से नहीं हो सकता। अतः अग्निहोत्र शाला से अग्नियां लाकर अपने आप को जलाते हैं। शङ्खचूड़—(मन ही मन) बड़े कष्ट की बात है। मुझ अकेले के लिए यह विद्याधर कुल सारा ही नष्ट हो रहा है। तो ऐसा (करता हूँ)। (प्रकट) हे तात ! बिना निश्चय किए ही ऐसा साहस करना उचित नहीं। भाग्य के खेल विचित्र हैं। कदाचित् 'यह नाग नहीं है' ऐसा जान कर गरुड़ उसे छोड़ (ही) दे। अतः इसी मार्ग से गरुड़ का पीछा करते हैं। वृद्धा—सब प्रकार से देवताओं की कृपा से हम जीते हुए पुत्र का मुख देखेंगे। मलयवती—(मन ही मन) मुझ अभागिन के लिए यह दुर्लभ है। १. आहिताग्नि = अग्निहोत्री। जो घर में यज्ञ की अग्नि सदा जलाए रखते हैं; बुझने नहीं देते। २. न विहितः = विधान नहीं किया गया। शास्त्रकारों ने अनुमति नहीं दी। ३. अग्नीन् = तीन प्रकार की अग्नियां बताई हैं — दक्षिण, गार्हपत्य तथा आहवनीय।