नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २२५ ) (मेरे) अधिक रक्त पी लेने पर भी (इस) धीरता के समुद्र को कोई ग्लानि (मलिनता) नहीं। माँस के काटने से उत्पन्न हुई पीड़ा को धारण करते हुए भी (इसका) मुख हर्ष से प्रसन्न है। (इसका) जो अङ्ग (अभी तक) नष्ट नहीं हुआ वहां यह रोमाञ्च स्पष्ट दिखाई दे रहा है। (और) मुझ अपकार करने वाले पर भी इसकी दृष्टि ऐसे पड़ रही है मानों किसी उपकारी व्यक्ति पर पड़ रही हो। अतः इसकी इस धैर्य-वृत्ति से मुझे उत्सुकता ही पैदा हुई है। अस्तु, अब और इसे नहीं खाऊँगा। तो पूछता हूँ यह कौन है। (हट जाता है) नायक—(गरुड़ को मांस के काटने से विमुख हुआ देखकर)— मेरी नाड़ियों के मुखों से अभी रक्त वह रहा है। अभी तक मेरे शरीर में मांस है। तुम्हारी तृप्ति भी मैं नहीं देख रहा। तो हे गरुड़ ! तुम (मेरे शरीर को) खाने से क्यों हट गए हो ? गरुड़—(मन ही मन)—आश्चर्य है ! आश्चर्य है !! क्या इस दशा में भी, इस प्रकार तेजस्वी वचन बोल रहा है !!! (प्रकट) हे महात्मन्—
- मलिनता; थकावट; कमज़ोरी।
- प्रसन्न; आनन्दित; शान्त।
- चू रहा है; बह रहा है।