भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

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( २२७ ) मैं ने तो अपनी चोंच से आपके हृदय से रक्त ही निकाला है ; पर आपने तो इस धैर्य से हमारा हृदय ही हर लिया है (वश में कर लिया है) । अतः मैं यह सुनना चाहता हूँ कि आप कौन हैं। नायक — इस प्रकार भूख से पीड़ित तुम (अभी) सुनने योग्य नहीं हो । अतः (पहिले) मेरे मांस तथा रक्त से अपनी तृप्ति कर लो । शङ्खचूड— (सहसा पास जा कर) हे गरुड़ ! मत करो, ऐसा साहस मत करो । यह नाग नहीं है । इसे छोड़ दो । मुझे खाओ । मैं ही वासुकि के द्वारा तुम्हारे भोजन के लिए भेजा गया हूँ । [यह कहकर अपनी छाती भेंट करता है] (शङ्खचूड़ को देखकर, दुःख के साथ, मन ही मन) — हाय, शङ्खचूड ने आकर मेरे मनोरथ को निष्फल कर दिया ! गरुड— (दोनों को देखकर) तुम दोनों के वध्यचिह्न है । तो कौन (वस्तुतः) नाग है यह मैं नहीं समझ सका । शङ्खचूड़—आप का भ्रम उचित नहीं । (क्योंकि—)

  1. निकालना; वश में करना; हरना ।