भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

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( २६५ ) फिर भी यह हो— (भरतवाक्य)— प्रसन्न हुए मोरों को नचाते हुए वादल समय पर वर्षा करें और पृथ्वी को उगे हुए घने हरे धानों की चादर से ढक दें। [तथा प्रजा के लोग विपत्तियों से मुक्त हो ईर्ष्या-रहित मनों से पुण्य सञ्चय करते हुए बन्धुओं तथा मित्रों के साथ घनी गोष्ठियों में आनन्द मनाते हुए प्रसन्न रहें। और भी— सारे विश्व का कल्याण हो। सब प्राणी दूसरों के हित करने में लगे रहें। सब दोष न हों। (और) लोग सर्वत्र सुखी हों। [सब का प्रस्थान] ॥ पाँचवां अङ्क समाप्त ॥ ॥ नागानन्द (नाटक) समाप्त ॥

  1. चि+शानच्+प्रथमा बहुवचन ।