भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

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( २८० ) आरम्भ में आने वाला विष्कम्भक कहलाता है। एक या अधिक मध्यम पात्रों के द्वारा प्रयोग किया गया विष्कम्भक ‘शुद्ध कहलाता है और नीच तथा मध्यम दोनों प्रकार के पात्रों द्वारा प्रयोग किए हुए को ‘मिश्र विष्कम्भक’ कहते हैं। प्रवेशक तथा विष्कम्भक में यह अन्तर है कि ‘प्रवेशक’ में सब पात्र नीच होते हैं और ‘विष्कम्भक’ के मध्यम या नीच और मध्यम। दूसरे, ‘विष्कम्भक’ के प्रथम अङ्क के आरम्भ में भी आने के लिए कोई निषेध नहीं परन्तु ‘प्रवेशक’ प्रथम अङ्क के आरम्भ में नहीं आ सकता। ११. भरत-वाक्य — नाटक के अन्त में, आशीर्वचन युक्त अथवा शुभकामना सूचक श्लोक अथवा श्लोकों को भरतवाक्य कहते हैं। नाट्यशास्त्र के जन्मदाता भरत मुनि के सम्मान में भरतवाक्य का प्रयोग होने से इस का नाम भरतवाक्य पड़ गया है। इस में राष्ट्र और जाति आदि केलिए मंगल-कामना की जाती है। भरतवाक्य से पहिले ‘तथापीदमस्तु’ वाक्य का प्रयोग प्रायः होता है। III प्राकृत— प्राकृत संस्कृत से ही निकली कही जाती है: — “प्रकृतिः संस्कृतम्। तत आगतं प्राकृतम्॥ कई कहते हैं कि संस्कृत और प्राकृत दो बहिने हैं। जिस समय शिक्षित समाज के बोलने की भाषा अथवा साहित्यिक भाषा संस्कृत थी, उस समय साधारण लोगों की भाषा उस से भिन्न थी जिसे प्राकृत के नाम से पुकारा जाता था: — “प्रकृतानां (प्राकृत जनानां) भाषा प्राकृतम्”