भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

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( २७६ ) नीच पात्रों द्वारा प्रयुक्त होने के कारण इस में उक्तियां उत्कृष्ट अथवा रमणीय नहीं होतीं:— “प्रवेशकोऽनुदात्तोक्त्या नीचपात्रप्रयोजितः ।” ७. विदूषक — जो अपने विकृत अङ्गों से, ऊटपटांग बातों से और अनोखे वेष से सामाजिकों को हंसाता है उसे विदूषक- कहते हैं । ८. स्वगतम् (अथवा आत्मगतम्) — “अश्राव्यं खलु यद्वस्तु तदिह स्वगतं मतम्” । जो बात रङ्गमञ्च पर ठहरे हुए शेष पात्रों को सुनाने योग्य नहीं होती उसे 'स्वगतम्' कहते हैं। ऐसी बात को एक पात्र दूसरे पात्र अथवा पात्रों से नहीं कहता वरन् अपने मन में ही कहता है; परन्तु इस प्रकार कहता है कि सामाजिक सुन सकते हैं। ६. प्रकाशम् — “सर्वश्राव्यं प्रकाशं स्यात् ।” 'स्वगत' के पश्चात् जो बात सब को सुनानी होती है उसे. 'प्रकाशम्' अथवा 'प्रकट' कहते हैं । १०. मिश्रविष्कम्भक— वृत्तवर्तिष्यमाणानां कथांशानां निदर्शकः । संक्षिप्तार्थस्तु विष्कम्भ आदावङ्कस्य दर्शितः ॥ मध्येन मध्यमाभ्यां वा पात्राभ्यां सम्प्रयोजितः । शुद्धः स्यात् स तु सङ्कीर्णो नीचमध्यमकल्पितः ॥ बीती हुई और आगे होने वाली कथांशों का सूचक अङ्क के-