नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २८४ ) ११. “अन्ते हल्”— पदान्त में हलन्त का लोप हो जाता है :— देवात् से देवा; जगत् से जग; मनस् से मन इत्यादि । १२. “पो वः”— पदान्त अथवा पद के बीच के प् को व् हो जाता है :— शापः से सावो । १३. “टो डः”; “ठो ढः”— ट् और ठ् को क्रमशः ड् और ढ् हो जाता है ;— नटः से णडो; पठ से पढ । १४. “डस्य लः”— ड् को ल् हो जाता है :—तडागः से तलाओ । १५. यदि क्, ग्, च्, ज्, त्, द्, प्, य्, और व् आरम्भ में न हों तो प्रायः इन का लोप हो जाता है:— लोकः से लोओ; सागरम् से साअरं; वातः से वाओ; कपि से कइ; जीव से जीअ; वायु से वाउ; नयन से णअण इत्यादि । १६. यदि ख्, घ्, थ्, ध् और भ् आरम्भ में न हों तो इन के स्थान में ‘ह्’ आ जाता है:— मुखम् से मुहं; मेघ से मेह; गाथा से गाहा; नभसः से णहसो । १७. (क) “उपरिलोपः—क्, ग्, ड्, त्, द्, प्, ष्, सां”— संयुक्त अक्षरों में इन व्यंजनों में से कोई आदि में हो तो उस का लोप हो जाता है और आगे के वर्ण को द्वित्व हो जाता है:— भक्त से भत्त; अद्य से अज्ज; स्निग्ध से सिणिद्ध; उत्पल से उप्पल; मुद्गर से मुग्गर; सुप्त से सुत्त; हस्त से हत्थ । (ख) “अधो मनयां”:—संयुक्त अक्षरों में म्, न्, य् में से कोई अन्तिम हो तो इनका लोप हो जाता है और पहिले व्यंजन को द्वित्व हो जाता है:— युग्म से जुग्ग; विघ्न से विग्ध; योग्य से जोग्ग ।