नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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( २८५ ) (ग) "सर्वत्र लवरां" :— संयुक्त अक्षर में ल्, व्, र् का सदा लोप हो जाता है और दूसरे अक्षर को (चाहे वह पहिले ही या पीछे) द्वित्व हो जाता है :— विप्लव से विक्कव, उज्ज्वल से उज्जल । १८. 'त्य' 'ध्य' तथा 'द्य' के स्थान में क्रमशः च्च, छ् अथवा च्छ; और ज्ज हो जाता है — नित्य से णिच्च; सत्य से सच्च; वैद्य से वेज्ज १६. ध्य और ह्य के स्थान मे ज्झ हो जाता है। अध्ययन से अज्झअण इत्यादि ।