नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री हर्ष-रचित “नागानन्द” भूमिका संस्कृत नाट्य-कला की उत्पत्ति :- निश्चित रूप से यह कह सकना कि संस्कृत में नाटकों का आरम्भ कब हुआ असम्भव है । नाट्य कला के सर्व-प्रथम नमूने जो हमारे हस्तगत हुए हैं वे इतने पक्व हैं कि वे नाट्य-कला के आदि काल के कदापि नहीं हो सकते; वे तो उस कला की प्रौढ़ावस्था के द्योतक हैं । प्राचीनतम प्राप्त नाट्य-लक्षण-ग्रन्थ (भरत-कृत) नाट्य-शास्त्र के आधार पर परम्परागत सिद्धान्त के अनुसार नाट्य-कला की उत्पत्ति दैवी बताई जाती है। कहते हैं कि त्रेतायुग के आरम्भ में देवता और मानव मिलकर ब्रह्मा के पास गए और अपने मनोरञ्जन के लिए किसी विशेष वस्तु की अभ्यर्थना पूर्वक मांग की । ब्रह्मा ने ऋग्वेद से कथोप- कथन, सामवेद से गान, यजुर्वेद से अभिनय-कला और अथर्ववेद से रस लेकर एक पञ्चमवेद बनाया जिसका नाम नाट्य-वेद रखा गया । इस में शिव ने ताण्डव, पार्वती ने लास्य और विष्णु ने चार नाट्य- शैलियां मिलाईं । विश्व कर्मा ने रंगमञ्च तैयार किया। और पृथ्वी पर इसे भेजने का कार्य भरत मुनि को सौंपा गया । भरत मुनि स्वयं सर्व प्रथम सूत्रधार बने । और सब से पहिले नाटक के पात्र गन्धर्व तथा अप्सराएँ थीं । दृश्य काव्य को संस्कृत आचार्यों ने 'रूपक' का नाम दिया है । अब इस अर्थ में साधारणतः 'नाटक' शब्द का प्रयोग होता है । रूपक