नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( ४६ ) मैं ब्राह्मण अतिथि बनकर मुनियों के पास से प्राप्त कन्द मूल फलों से (ही) अपने प्राण धारण करूँ। नायक — (ऊपर देख कर) अरे, भगवान् सूर्य आकाश के मध्य (शिखर पर) पहुंच गए हैं। यतः— गरमी के कारण, उसी समय (गण्डस्थल से) घिसे हुए चन्दन के रस से पीले कपोलों को धारण किए हुए, अच्छी तरह से भीगे हुए अपने विशाल कानों की हवा से अपने मुख पर पंखा करता हुआ, सूंड से फेंकी गई पानी की बूंदों से छाती को भली प्रकार सींचता हुआ यह हाथियों का राजा तीव्र उत्कण्ठा से उत्पन्न विरही की (दशा के समान) असह्य दशा को धारण कर रहा है। अतः आओ, हम भी चलें। (दोनों का प्रस्थान) प्रथम अङ्क समाप्त।
- गण्डस्थल के साथ रगड़ने से घिसे हुए।
- गाढं तीव्रम्। आयल्लकम् = उत्कण्ठा। तेन दुःसहा, तामिव विरहिजनदशामिव दशाम् (अवस्थां) धत्ते (बिभर्ति, धारयति)।