भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 309 में से

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( ६१ ) नायिका- (हर्ष तथा घबराहट के साथ उठकर, दो तीन कदम चलकर) कहाँ ? कहाँ है वह ? चेटी- (उठकर, मुस्कराते हुए) राजकुमारी, वह कौन ? नायिका- (लज्जित हो बैठ कर, मुहँ नीचे किए रहती है) चेटी - राजकुमारी, मैं तो यह कहना चाहती हूँ कि यह आप के हृदय में स्थित वर देवी ने स्वप्न में दिया। पीछे उसे आपने क्षणभर के लिए फूलों के बाणों से रहित (साक्षात्) कामदेव के समान देखा। वही आपके इस सन्ताप का कारण है जिससे यह स्वभाव से (ही) शीतल चन्दनलतागृह भी आपके (इस) सन्ताप के कष्ट को दूर नहीं कर सकता। नायिका- (चतुरिका के बाल सँवारती हुई) सखी ! तू सचमुच चतुर है। और तुझ से क्या छिपाना है ? सो कहती हूँ ।

  1. 'काम' तथा 'मनस्' आगे होने पर तुमुन् का अनुस्वार नहीं रहता ।
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