भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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सर्गः २ ] जीवातु मद्यन्तिकासहितम् । १०९ मानिनी 'स्त्रीणामीर्ष्याकृतः कोपो मानोऽन्यासङ्गिनि प्रिये' इत्युक्तलक्षणो मानः । मदती नायिका इव अखिळया निशा = निशया, सर्वरात्रिप्रासादनेनेत्यर्थः । न प्रसाद् = प्रसन्नहृदया नाभूत्, तादृक् शोभादिति भावः ॥७७॥ उस नगरी की बावलियाँ-- सुन्दर दाँतवाली महिलाओं के जलविहार के समय आलिङ्गन के कारण, कुङ्कुम के रंग से कषायित ( लाल रंग से युक्त, सुगन्धि से युक्त, ) मध्यभागवाली हो जाती थीं और सारी रात बीत जाने पर भी उसी प्रकार प्रसन्न ( निर्मल ) नहीं होती थीं ( 'लाल' ही बनी रहती थीं ) जैसे अन्य रमणियों में अनुराग होने के कारण, पति के अवयव में लगे हुए कुंकुम आदि भोगचिह्नों को देखकर, ईर्ष्या से कलुषित हृदयवाली हो, हठ पकड़ने वाली मानिनी नायिका समूची रात बीत जाने पर भी प्रसन्न नहीं होती ( रोषयुक्ता ही बनी रहती है ) ॥ क्षणनीरवया यया निशि श्रितवप्रावलियोगपट्टया । मणिवेश्ममयं स्म निर्मलं किमपि ज्योतिरवाह्यमीक्ष्यते ॥७८॥ क्षणेति । निशि=निशीथे [क्षणनीरवया] क्षणं नीरवया एकत्र सुप्तजनात्वाद्, अन्यत्र ध्यानस्तिमितत्वान्निःशब्दया [ श्रितवप्रावलियोगपट्टया ] श्रितः प्राप्तः वप्रावलिः योगपट्ट इव, अन्यत्र वप्रावलिरिव योगपट्टो यया सा तथोक्ता,.यया = नगर्या मणिवेश्ममयं तद्रूपं निर्मल अबाद्यम् = अन्तर्वर्ति किमपि = अवाङ्मन- सगोचरं ज्योतिः = प्रभा, आत्मज्योतिश्च । ईक्ष्यते = सेव्यते स्म । अत्र प्रस्तुत- नगरीविशेषसाम्यादप्रस्तुतयोगिनीप्रतीतेः समासोक्तिः ॥७८॥ मध्य रात्रि में ( सबलोगों के सो जाने के कारण ) नीरवता को प्राप्त हो, वप्रावली ( प्राकार-पंक्ति ) रूप योगपट्ट ( योगाभ्यास काल में गेरुआ वस्त्र ) धारण करने वाली कुण्डिन नगरी, रात्रि के समय अबाद्य ( परकोटे के भीतर ) रत्न ( स्फटिकादि मणि ) निर्मित गृहरूप निर्मल ( भव्य ) और ( अलौकिक सौन्दर्य के कारण ) अवर्णनीय ज्योति ( तेज, छुटा ) को उसी प्रकार प्राप्त होती थी; जिस तरह आधी रात के समय ब्रह्मसाक्षात्कार काल में, ध्यान के कारण निःस्तब्ध हो कोई योग-साधिका रात्रि में अबाद्य ( हृत्पुण्डरीक के भीतर ), निर्मल ( अविद्यादि दोष रहित ) किसी अनिर्वचनीय ( वाणी तथा मन से परे ) ज्योति ( परम ब्रह्म ) का साक्षात्कार करती है ॥७८॥ विललास जलाशयोदरे क्वचन द्यौरनुबिम्बितेव या ।