भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 226 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 126

११० नैषधचरितम् । [ द्वितीयः परिखा-कपट-स्फुट-स्फुरत्प्रतिबिम्बानवलम्बिताम्बुनि ॥७९॥ विललासेति । या = नगरी [ परिखा कपट-स्फुट-स्फुरत्-प्रतिबिम्बान- वलम्बिताम्बुनि ] परिखायाः कपटेन व्याजेन, स्फुटं परितो व्यक्तं, तथा स्फुरता प्रतिबिम्बेनावलम्बितं, मध्ये चागृह्यमाणं चाम्बु यस्मिन् तस्मिन् । प्रतिबिम्बाक्रान्त- मम्बु परितः स्फुरति, प्रतिबिम्बदेशे न स्फुरति तेनैव प्रतिबिम्बादिति भावः। क्वचन = कुत्रचिज्जलाशयोदरे = हृदमध्ये, कस्यचित् हृदस्य मध्य इत्यर्थः । अनुबिम्बिता = प्रतिबिम्बिता द्यौः = अमरावती इव विललास, इत्युत्प्रेक्षा ॥७६॥ यह नगरी-( अपने चारो स्थित ) खाई के जल के बहाने स्पष्टरूप से ( देवपुरी की ) प्रतिबिम्ब स्वरूप और ( उसकी अपेक्षा अधिक विस्तृत होने के कारण कहीं कहीं परिल्छाईं नहीं पड़ रही थी अतः ) अनाक्रान्त जल वाले, किसी सरोवर के भीतर प्रतिबिम्बित-स्वर्गपुरी के समान शोभायमान प्रतीत हो रही थी ( अर्थात् वह नगरी इस प्रकार प्रतिभासित हो रही थी मानो किसी जलाशय के भीतर ऊपरस्थित स्वर्गपुरी की ही परिल्छाईं पड़ रही हो । यह नगरी स्वर्गपुरी से भी अधिक बड़ी थी, इसलिए उसके समूचे खाई के जल में स्वर्ग की परिल्छाईं नहीं पड़ रही थी; शेष भाग उसी प्रकार अनाक्रान्त रह जाता था, अतः वहीं बाहरी खाई का जल मालूम पड़ रहा था ) ॥७६॥ व्रजते दिवि यद्गृहावली-चल-चेलाञ्चल-दण्ड-ताडनाः। व्यतरन्नरुणाय विश्रमं सृजते हेलि-हयालि-कालनाम् ॥ ८० ॥ व्रजत इति । [ यद्गृहावली-चल-चेलाञ्चल-दण्ड-ताडनाः ] यस्यां नगर्यां गृहावलीषु चलाः चञ्चलाः चेलाञ्चलाः पताकाग्राणि ता एव दण्डास्तैः ताडनाः कशाघाता इत्यर्थः । ताः कर्यो दिवं व्रजते = खे गच्छते [ हेलि हयालि-काल- नाम् ] हेलिहयालेः सूर्याश्वपङ्क्तेः । 'हेलिरालिङ्गने रवौ' इति वैजयन्ती । कालनां चोदनां सृजते = कुर्वते अरुणाय = सूर्यसारथये विश्रमं = स्वयं तत्कार्यकरणाद्वि- श्रान्तिम् । 'नोदात्तोपदेश' इत्यादिना घञि वृद्धिप्रतिषेधः । व्यतरन् = ददुः । अत्र हेलिहयालेश्चेलाञ्चलदण्डताडनासम्बन्धेऽपि तत्सम्बन्धोक्तेरतिशयोक्तिभेदः । तेन गृहाणामर्कमण्डलपर्यन्तभौन्नत्यं व्यज्यत इति अलङ्कारेण वस्तुध्वनिः ॥८०॥ जिस नगरी की ( गगन-चुम्बी ) अट्टालिकाओं के ऊपर, ( हवा के वेग से ) चञ्चल हुए पतङ्गि-वस्त्र की नोंक पर लगे हुए डण्डे के आघात--( कुण्डिनपुर के